बरेली: नौमहला हुआ करता था क्रांतिकारियों का अड्डा, अंग्रेजों ने मचाया था कत्ल-ए-आम
बरेली, अमृत विचार। नवाब खान बहादुर खान की कयादत में 1857 की क्रांति का बिगुल बजा तो दूसरे क्रांतिकारी एकजुट होने लगे। बरेली में इन क्रांतिकारियों का ठिकाना था। नौमहला जिसे हम नौमहला मस्जिद के नाम से भी जानते हैं, कहा जाता है कि अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की बैठक भी यहां की गई थी …
बरेली, अमृत विचार। नवाब खान बहादुर खान की कयादत में 1857 की क्रांति का बिगुल बजा तो दूसरे क्रांतिकारी एकजुट होने लगे। बरेली में इन क्रांतिकारियों का ठिकाना था। नौमहला जिसे हम नौमहला मस्जिद के नाम से भी जानते हैं, कहा जाता है कि अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की बैठक भी यहां की गई थी लेकिन असल कत्ल-ए-आम नौमहला इलाके में 7 मई 1858 को हुआ जब बरेली में दोबारा यूनियन जैक लहरा रहा था।
अंग्रेज जानते थे कि नौमहला क्रांतिकारियों की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र है। नकटिया में युद्ध जीतने के बाद जब अंग्रेजी अफसर शहर में दाखिल हुए तो खास तौर से नौमहला को निशाना बनाया गया। इलाके के कई भवनों और मकानों को नष्ट कर दिया गया। केवल नौमहला मस्जिद को ही बाकी छोड़ा गया लेकिन सैयद इस्माईल शाह अजान देते वक्त शहीद हो गए। इसके अलावा काफी लूटमार भी की गई। ब्रिटिश जासूस क्रांति में हिस्सा लेने वालों को पकड़वा रहे थे। कबीर शाह बख्शी, मोहसिन खां, अहसान खां, मुबारक शाह, जाकिर अली को सरेआम फांसी दे दी गई।
कहा जाता है कि नौमहला इलाके में एक बड़ी इमारत थी जिसके अंदर 50 से 60 रूहेला सैनिक अंग्रेजों से संघर्ष के लिए तैयार थे। 93 रेजीमेंट की कंपनी ने इस मकान को घेरकर हमला किया। अंग्रेज अफसर अपने सैनिकों के साथ रायफलें लेकर अंदर दाखिल हुआ। एक के बाद एक क्रांतिकारियों को कत्ल करना शुरू कर दिया। अंग्रेज शहर पर अधिकार कर चुके थे, लूटमार की स्थिति पैदा हो गई थी। लिहाजा खान बहादुर खान और शोभाराम जैसे उनके दूसरे साथियों को बरेली छोड़ना पड़ा। कहा जाता है कि अंग्रेजों के कत्ल-ए-आम के बाद 1906 में कहीं जाकर यह इलाका दोबारा आबाद हो पाया।
हाफिज रहमत खान ने बसाया था नौमहला
दरगाह नासिर मियां के खादिम सूफी शाने अली कमाल मियां साबरी नासरी बताते हैं कि 1749 में रूहेला सरदार नवाब हाफिज रहमत खां ने बरेली में अधिकार किया तो उन्होंने नौमहला को बसाया और अपने पीर सैयद मासूम शाह को सौंप दिया। नौमहला में आज भी सैयद अहमद शाह बाबा और उनके बेटे सैयद मासूम शाह की मजार है।
1857 तक नौमहला घनी आबादी का इलाका था। बड़ी तादाद में सैयदों के परिवार यहां बसे हुए थे। सैयद मासूम शाह के वंशजों ने क्रांतिकारियों की हर तरह से मदद की। नवाब खान बहादुर खान, सूबेदार बख्त खान, रिसालदार मोहम्मद शफी समेत तमाम क्रांतिकारी यहां आया करते थे।
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