बेच दिया भई बेच दिया उत्तराखंड को बेच दिया… हल्द्वानी में आखिर क्यों लगे नारे ? मुख्यमंत्री जी सुन लीजिए गुहार… देखें VIDEO

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हल्द्वानी, अमृत विचार। उत्तराखंड में हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर सशक्त भूकानून लाने की मांग लंबे समय से उठ रही है। भूमाफियाओं के चंगुल में फंसे पहाड़ी राज्य की इस पीड़ा को सरकार भी जानती है लेकिन अब तक इस दिशा में कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया। देखें वीडियो: भूकानून को लेकर हल्द्वानी में …

हल्द्वानी, अमृत विचार। उत्तराखंड में हिमाचल प्रदेश की तर्ज पर सशक्त भूकानून लाने की मांग लंबे समय से उठ रही है। भूमाफियाओं के चंगुल में फंसे पहाड़ी राज्य की इस पीड़ा को सरकार भी जानती है लेकिन अब तक इस दिशा में कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया।

देखें वीडियो: भूकानून को लेकर हल्द्वानी में गरजे युवा

आज हल्द्वानी के बुद्ध पार्क में विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक संगठनों से जुड़े युवाओं ने ‘बेच दिया भई बेच दिया उत्तराखंड को बेच दिया’ और ‘उत्तराखंड मांगे भूकानून’ जैसे नारों के बीच एक बार फिर आवाज बुलंद की। युवाओं ने कहा कि भूमाफिया, नौकरशाह और राजनेताओं के गठजोड़ ने पहाड़ को वीरान बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। प्रदेश के पहाड़ी जिलों से लगातार पलायन हो रहा है और भूमाफिया उन जमीनों पर खुर्दबुर्द करने में जुटे हैं लेकिन खोखले होते पहाड़ों के प्रति सरकार पूरी तरह से असंवेदनशील रूख अपनाए हुए है। जिसका खामियाजा उत्तराखंड के लोगों को भुगतना पड़ रहा है।

बताते चलें कि आज उत्तराखंड में जमीन के हालत क्या हैं इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि राज्य में हर साल औसतन पांच हजार हेक्टेयर कृषि भूमि खत्म हुई है। कुल लगभग आठ लाख हेक्टेयर भूमि में से तकरीबन एक लाख हेक्टेयर भूमि खत्म हो चुकी है। हर साल औसतन तीन हजार हेक्टेयर खेती की भूमि बंजर हो रही है। यह तो सरकारी आंकड़ा है, असलियत तो इससे अधिक भी हो सकती है।

बताते चलें कि साल 2000 में उत्तराखंड राज्य बना। जिसके बाद प्रदेश में बड़े स्तर पर हो रही कृषि भूमि की खरीद फरोख्त, अकृषि कार्यों और मुनाफाखोरी की शिकायतों पर साल 2002 में कांग्रेस सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने संज्ञान लेते हुए साल 2003 में ‘उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950’ में कई बंदिशें लगाईं। इसके बाद किसी भी गैर-कृषक बाहरी व्यक्ति के लिए प्रदेश में जमीन खरीदने की सीमा 500 वर्ग मीटर हो गई। इसके बाद साल 2007 में बीजेपी की सरकार आई और तत्कालीन मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी ने अपने कार्यकाल में पूर्व में घोषित सीमा को आधा कर 250 वर्ग मीटर कर दिया। लेकिन यह सीमा शहरों में लागू नहीं होती थी।

2017 में भाजपा सरकार आने के बाद इस अधिनियम में संशोधन करते हुए प्रावधान कर दिया गया कि अब औद्योगिक प्रयोजन के लिए भूमिधर स्वयं भूमि बेचे या फिर उससे कोई भूमि खरीदे तो इस भूमि को अकृषि करवाने के लिए अलग से कोई प्रक्रिया नहीं अपनानी होगी। औद्योगिक प्रयोजन के लिए खरीदे जाते ही उसका भू उपयोग अपने आप बदल जाएगा और वह अकृषि या गैर कृषि हो जाएगा। इसी के साथ गैर कृषि व्यक्ति द्वारा खरीदी गई जमीन की सीमा को भी समाप्त कर दिया गया। अब कोई भी कहीं भी जमीन खरीद सकता है।

ऐसे में उत्तराखंड में ऐसे भू-कानून की जरुरत है जो राज्य की आवश्यकता, विकास, लोगों की आकांक्षाएं और उसके साथ-साथ उत्तराखंडी परिवेश और संस्कृति को बचाने की मुहिम को कानूनी रूप देकर संरक्षित कर सके।

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