अल्मोड़ा: मौसम चक्र में बदलाव को मानवीय गतिविधियां जिम्मेदार
हिमालयी क्षेत्र का तापमान 0.2 डिग्री की दर से बढ़ रहा
अल्मोड़ा, अमृत विचार। मौसम चक्र में हो रहे बदलाव के लिए काफी हद तक मानवीय गतिविधियों को जिम्मेदार माना जा रहा है।
औद्योगिक क्रांति के बाद से कार्बन डाई ऑक्साइड और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से ध्रुवों के तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है। इन गैसों के उत्सर्जन की यही गति रही तो कई क्षेत्रों में बर्फ देखने तक को नहीं मिलेगी।
इसके अलावा वायु प्रदूषण, पहाड़ों में बढ़ती व्यावसायिक गतिविधियों, हिमालयी क्षेत्रों में बन रहे कंक्रीट के जंगल, जीवाश्म ईंधन के प्रयोग, वातावरण को गर्म कर रही मीथेन गैस, वन संपदा को पहुंचाए जा रहे नुकसान का हिमालयी पारिस्थितिकी पर विपरीत असर पड़ रहा है जिससे मौसम चक्र लगातार बदल रहा है और तापमान बढ़ रहा है।
समय पर बारिश और पर्याप्त बर्फबारी का न होना भी इसका मुख्य कारण माना जा रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण ही हिमालयी क्षेत्र का तापमान 0.2 डिग्री की दर से बढ़ रहा है, जो वैश्विक दर से कहीं ज्यादा है। साथ ही आने वाले समय में इसके बढ़ने की और अधिक संभावना है।
पिघलते रहे ग्लेशियर तो बढ़ जाएगा खतरा
प्राकृतिक घटनाओं में जिस तरह पिछले कुछ सालों में एकाएक जो बदलाव आया है, वह जलवायु परिवर्तन का ही कारण है। पिछले कुछ सालों में तूफान, भूकंप के तेज झटके आने, नदियों में बाढ़ जैसी घटनाएं बढ़ी हैं।
जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान बढ़ रहा है, जिसका असर ग्लेशियरों पर दिखाई दे रहा है। पर्यावरणविदों की मानें तो ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार यही रही तो हिमालयी क्षेत्रों एवलांच की घटनाएं बढ़ सकती हैं। बादल फटने व अतिवृष्टि की घटनाएं तीन गुना तक बढ़ सकती हैं।
ग्लेशियरों के पिघलने से वह सिकुड़ जाएंगे और आपदा को जन्म देंगे। झीलें भरेंगी और फट जाएगी, जिससे होने वाले नुकसान का जायजा भी नहीं लगाया जा सकता। पीने और सिंचाई के पानी की कमी हो सकती है जबकि जंगली जानवरों का आतंक बढ़ने, प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि, खेतीबाड़ी चौपट होने और परंपरागत फसलों का दायरा कम होने से पलायन की समस्या भी बढ़ सकती है, जबकि सूखा पड़ने की समस्या से भी इंकार नहीं किया जा सकता है।
