पीलीभीत: राष्ट्रपति से पाया सम्मान, स्वच्छता के बने ब्रांड एंबेसडर..फिर भी दूर न हुई बदहाली, रोटी को भी मोहताज छोटेलाल
2018 में मिला था सम्मान, बोले- कही गई आर्थिक मदद आज तक न मिली, अब नहीं हो रही सुनवाई
पीलीभीत, अमृत विचार। स्वच्छता के लिए लोगों को प्रेरित करने वाले छोटेलाल उम्र के अंतिम पड़ाव में पहुंचने के बाद मुफलिसी की जिंदगी जीने को मजबूर हैं। एक समय ऐसा भी आया जब स्वच्छता अभियान के बीच उनकी सेवाएं देख न सिर्फ जिला स्वच्छता समिति के ब्रांड एंबेसडर बना दिया। बल्कि राष्ट्रपति के हाथों पुरस्कार से नवाजा गया।
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छोटेलाल के अनुसार उन्हें पुरस्कार के रुप में पांच लाख रुपये की धनराशि का चेक देने की भी बात कही गई थी। मगर पांच साल बीतने के बाद चेक तो दूर अब उनकी खैर खबर लेने वाला भी कोई नहीं बचा। आलम यह है कि वह बीमारी के दौर से प्रधानमंत्री आवास योजना से बनवाई गई एक छोटी से कोठरी में गुमनाम और बदहाली भरी जिंदगी जीने को मजबूर हैं।
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इतना ही नहीं आर्थिक स्थिति खराब होने के चलते अब आवास बेचने को मजबूर हैं। जिसका बोर्ड उन्होंने अपने घर के बाहर लटका रखा है। हम बात कर रहे हैं शहर के मोहल्ला शेर मोहम्मद शेरों वाली मठिया के रहने वाले 90 वर्षीय बुजुर्ग छोटेलाल कश्यप की। करीब पांच साल पहले की बात है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्वच्छता को लेकर चलाई जा रही मुहिम के बीच इनका नाम तराई वासियों के लिए एक अलग पहचान बना।
धार्मिक स्थलों, घर के आसपास की सड़क समेत अन्य स्थानों पर साफ सफाई को लेकर तत्कालीन जिलाधिकारी डॉ.अखिलेश कुमार मिश्र की ओर से 30 अक्टूबर 2018 को उन्हें जिला स्वच्छता समिति पीलीभीत का ब्रांड अम्बेसडर घोषित कर अभिनंदन किया गया। इतना ही नहीं राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें पुरस्कृत करते हुए हौसला अफजाई भी की।
इतना ही नहीं राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने स्वयं उनकी कलाई पर घड़ी भी बांधी थी। जिसके बाद मास्टर छोटेलाल की मुफलिसी और संघर्षमय जीवन में बदलाव की उम्मीद जागी थी। सम्मानित होने के बाद कुछ समय तक तो तमाम मंचों पर छोटेलाल को दूसरे के लिए नजीर बनाकर अफसर पेश कराते रहे। मगर, धीरे-धीरे उनका नाम गुमनाम सा हो गया।
अब सम्मानित होने के पांच साल बाद उनकी सुध लेने वाला ही कोई नहीं। प्रधानमंत्री आवास योजना की मदद से बनाई गई एक कुटिया में ही जर्जर चारपाई, चंद बर्तन और कपड़ों के सहारे गुजर बसर चल रहा है। इतना ही नहीं मांग-खाकर किसी तरह अपना गुजारा कर रहे हैं। वैसे तो उनका आयुष्मान कार्ड भी बना है। मगर, उसकी मदद नहीं मिल सकी।
बताया कि करीब दो माह पहले काफी बीमार हो गए थे। ऐसे में इलाज कराने के लिए जगह-जगह हाथ फैलाने पड़े। बता दें कि उनके चार बेटे और एक बेटी है। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति भी बेहद कमजोर है। छोटे बेटे राजू ने बताया कि उसकी पत्नी भी बीमार है। वह गोलगप्पे का ठेला लगाकर गुजर बसर है। पत्नी बीमार हुई तो उसे भी ब्याज पर रुपये लेना पड़ गए।
पांच लाख के वादे भी झूठे
बुजुर्ग छोटेलाल ने बताया कि जब वह सम्मानित हुए थे। उसके बाद गुजर बसर करने के लिए उन्हें छह हजार रुपये मासिक मानदेय बांधा गया। ये उनके भरण पोषण के लिए था। बताते हैं कि तीन माह खाते में रुपये आए भी और फिर बंद हो गए। किस योजना और विभाग के जरिए मिले..इसके बारे में कुछ नहीं पता। इसके अलावा उनका कहना है कि पांच लाख रुपये की आर्थिक मदद दिलाने का भी वादा किया गया था। मगर पांच रुपये भी नहीं मिल पाए। इसके लिए कई बार जनप्रतिनिधि और अफसरों के चक्कर लगाए। दुखड़ा भी सुनाया..मगर सिर्फ टालमटोल ही हाथ लगी।
एक किमी पैदल मंदिर पहुंचकर भरते हैं पेट
आयुर्वेदिक कॉलेज मार्ग पर स्थित श्री सत्यनारायण मंदिर में प्रतिदिन जरुरतमंदों को निशुल्क भोजन कराया जाता है। राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजे गए छोटेलाल की आर्थिक स्थिति की बात करें तो उनका पेट इसी मंदिर में चल रही सेवा से भर रहा है।
उन्होंने बताया कि कभी कभार बच्चों के घर से भेाजन प्राप्त हो जाता है। वरना सुबह 11 बजे घर से निकल जाते हैं। करीब एक किमी पैदल चलकर मंदिर पहुंचते हैं और फिर 12 बजे वहां भोजन मुहैया हो जाता है। मगर बीमारी के चलते अब वहां जाना बंद कर दिया है। अब ठंड और पैर में दर्द होने की वजह से घर से नहीं निकलते हैं
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