बरेली: चमत्कार से कम नहीं था रामलला के आभूषण बनाने का आदेश मिलना

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हरसहायमल श्यामलाल ज्वैलर्स ने सोने-हीरे, माणिक्य, पन्ना से 14 दिन में तैयार किए रामलला के भव्य आभूषण

अनुपम सिंह/बरेली, अमृत विचार। अयोध्या में सोमवार को अपने नव्य-दिव्य मंदिर में विराजमान हुए रामलला के विग्रह को पहनाए गए आभूषण भी भव्य हैं। सोने-हीरे, माणिक्य, पन्ना से रामलला के आभूषण गढ़ने की जिम्मेदारी निभाने वाले हरसहायमल श्यामलाल ज्वैलर्स के मोहित आनंद और अंकुर आनंद गदगद हैं। वे कहते हैं कि रामलला के आभूषण बनाने का आदेश मिलना उनके लिए चमत्कार से कम नहीं था। सिर्फ 14 दिन का समय उन्हें दिया गया था लेकिन रामलला की कृपा से उन्होने इस चुनौती को पूरा कर लिया।

मोहित आनंद बरेली के निदेशक हैं और उनके छोटे भाई अंकुर आनंद लखनऊ की गोमतीनगर ब्रांच चलाते हैं। मोहित आनंद ने अमृत विचार से बातचीत में बताया कि यह जानकारी मिलने के बाद कि रामलला के आभूषण उन्हें बनाने हैं, वह हतप्रभ रह गए। कुछ समय तक समझ ही नहीं आया कि इसे कैसे व्यक्त करें। न कोई सोर्स न फोर्स। 

सिर्फ 14 दिनों के अंदर रामलला के बालपन की स्वाभाविकता के अनुरूप 14 दिव्य आभूषण तैयार करने की चुनौती पूरी करना उन्हीं की कृपा के बिना संभव नहीं था। फर्म के कुशल करीगरों ने दिन-रात मेहनत कर ये आभूषण तैयार किए। उन्होंने कहा कि गुणवत्ता, शुद्धता और विश्वास से भरे एक सदी से ज्यादा के सफर को जो आशीर्वाद मिला है, इसे सहजकर रखने की जिम्मेदारी और बड़ी है। इसे व्यक्त करने के लिए शब्द ही नहीं हैं।

1893 में शुरू हुआ कारोबार
बदायूं में मोहित आनंद के दादा के दादा हरसहायमल ने 1893 में आभूषणों का काम शुरू किया था। अब ये फर्म 130 साल पुरानी हो चुकी है। बदायूं में 100 साल से ज्यादा तक परिवार ने कारोबार किया। 2007 में बरेली आए । इसके बाद कारोबार बढ़ता गया। 2016 में लखनऊ में शोरूम खुला। वहां मोहित आनंद के छोटे भाई अंकुर आनंद जिम्मेदारी संभालते हैं।

1990 में मोहित आनंद ने संभाला कारोबार
मोहित बताते हैं लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद मैंने 1990 में बदायूं में कारोबार संभाला। 1994 में छोटे भाई को भी इसी में शामिल किया। 1996 में पिता आनंद प्रकाश का देहांत हो गया। यह साफ-सुथरा कारोबार है। इसलिए इसे ही चुना। हम लोग पांचवी पीढ़ी हैं। हम दो भाई हूं। मेरा 22 वर्षीय बेटा आर्यन और बड़ी बेटी आकृति है। बच्चों को इस कारोबार में लाने के बारे में अभी नहीं सोचा। दोनों यूएस में पढ़ाई कर रहे हैं।

प्रमाणिकता ही असली- नकली की पहचान
मोहित आनंद का कहना है कि कोई भी व्यवसाय हो, समय के हिसाब से बदलाव होते रहते हैं। सराफा में भी पहले की अपेक्षा चीजें ज्यादा बदली हैं। कई चुनौतियां भी हैं तो डिजिटल होने से कुछ आसानी भी हुई है। सलाह है कि हॉलमार्क लगे आभूषण ही खरीदें। प्रमाणिकता ही असली-नकली की पहचान है।

रामलला के प्रति अतुल्य आस्था काे ध्यान में रख बनाए आभूषण
मोहित आनंद ने बताया कि 2 जनवरी को ऑर्डर मिला। समय काफी कम था और चुनौती बड़ी। आर्डर मिलने के बाद नाप-फिटिंग व अन्य चर्चा के लिए तीन बार अयोध्या जाना पड़ा। रामलला से जुड़ी अतुल्य-अक्षुण्य आस्था का ध्यान रखना था। ऐसे में टीम ने लंबी रिसर्च की। पुरानी पेंटिंग देखीं। अध्यात्म रामायण, श्रीमद् वाल्मीकि रामायण, श्रीरामचरित मानस,आलवंदार स्त्रोत के अध्ययन, उनमें वर्णित श्रीराम की शास्त्र सम्मत शोभा के अनुरूप शोध और अध्ययन किया।

डिजाइन तैयार करने में दो दिन लग गए। इसके बाद 70 कुशल कारीगरों को लगाकर 14 दिन तक दिन-रात काम किया गया। 16 जनवरी की शाम को आभूषण तैयार कर मंदिर ट्रस्ट को सौंप दिए। आभूषणों में करीब 14 किलोग्राम सोना लगा है। तीन हजार माणिक्य, 18 हजार पन्ना के साथ हीरे भी जड़े हैं। अब मन बहुत आह्लादित है।

एक हजार साल तक हर रामनवमी पर रामलला के माथे पर पड़ेंगी सूर्य की किरणें
रामलला के विग्रह को लेकर एक हैरान कर देने वाली बात सामने आई है। हरसहायमल श्यामलाल ज्वैलर्स के निदेशक मोहित आनंद के अनुसार, रामलला को इस तरह से स्थापित किया गया कि अगले एक हजार साल तक हर रामनवमी के दिन 12 बजे सूर्य की किरणें प्रभु के माथे पर पड़ेंगी। यह किसी चमत्कार से कम नहीं है। मोहित आनंद के अनुसार ये दावा इसरो के वैज्ञानिकों का है।

बरेली के लिए गौरव
बरेली, अमृत विचार। रामलला के आभूषण बनाने के लिए हरसहायमल श्यामलाल ज्वैलर्स के मालिक मोहित आनंद काे सम्मानित किया गया । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह प्रांत प्रचारक धर्मेन्द्र ,विभाग प्रचारक धर्मेन्द्र भारत ,महानगर प्रचारक मयंक ने शॉल ओढ़ाकर मोहित को सम्मानित किया। उन्होंने इसे बरेली के लिए गौरव का क्षण बताया।

14 किलो सोने से तैयार हुए हैं रामलला के आभूषण
रामलला को पहनाए गए आभूषणों में सोना, माणिक्य, पन्ना और हीरों का उपयोग किया गया है। मुकुट में 1700 ग्राम सोने के साथ ही हीरा, पन्ना, और माणिक्य हैं। मुकुट और हार पर सूर्य की छवि सूर्यवंश के प्रतीक के रूप में प्रदर्शित है। तिलक में 16 ग्राम सोना, हीरा, माणिक्य है। 65 ग्राम की अंगूठी, 500 ग्राम का गले हार, 660 ग्राम का पंचलड़ा, 750 ग्राम की करधनी, दो किलो की विजयमाला, 860 ग्राम के हाथ के कड़े और 560 ग्राम के पैर के कड़े हैं। कुल 14 किलो सोने से सभी आभूषण निर्मित हुए हैं।

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