यूं ही नहीं कहते हैं, राधा के बिना श्याम आधा
राधे-राधे और जयश्री राधे का बढ़ते महिमा गान के बीच राधा रानी के अनन्य भक्त वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज द्वारा राधा नम जप की महत्ता स्थापित करने के बाद तमाम लोगों के मन में राधा की शक्ति और भक्ति को लेकर अनेक प्रकार के प्रश्न हैं। आइए जानते हैं कि कौन हैं राधा और कैसे हुआ प्रादुर्भाव।
राधा का जन्म शक्ति और भक्ति का अवतार
राधा का जन्म शक्ति और भक्ति के अवतार के रूप में हुआ। वे परम प्रेम, समर्पण और भक्ति की मूर्ति हैं। श्रीकृष्ण और राधा का संबंध जीव और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है, इसीलिए राधा को कृष्ण से भी बढ़कर पूज्य माना जाता है, क्योंकि राधा के बिना कृष्ण की लीला अधूरी है। राधा रानी के जन्म को लेकर शास्त्रों और पुराणों का सार यही है कि राधा स्वयं श्रीकृष्ण की अनन्त शक्ति-ह्लादिनी शक्ति का अवतार हैं। उनका जन्म माता के गर्भ से नहीं बल्कि योगमाया से हुआ था। एक प्रसिद्ध मान्यता के अनुसार, रावली ग्राम (बरसाना के समीप) में वृषभानु और उनकी पत्नी कीर्ति देवी रहते थे। कीर्ति देवी धर्मपरायण होकर भी संतान-सुख से वंचित थी। एक दिन उन्होंने यमुना तट पर तपस्या की, तभी आकाशवाणी हुई, हे देवी, तुम्हें स्वयं लक्ष्मी स्वरूपा कन्या प्राप्त होगी, जो श्रीकृष्ण की अनन्त प्रेयसी और शक्ति का अवतार होगी। कुछ समय बाद कीर्ति देवी ने एक कन्या को कमल के फूल पर प्रकट होते हुए देखा। उसे वह अपने घर ले आईं। यही राधा थीं। एक अन्य किवंदती के अनुसार बाबा वृषभानु यमुना में स्नान कर रहे थे। एक कमल का फूल पानी में तैरता हुआ उनके पास आया। जिस पर राधा थीं। उन्हें वह भगवान का प्रसाद मानकर अपनी पुत्री बनाकर घर ले आए।
श्रीकृष्ण और राधा का संबंध आत्मा और परमात्मा का
कहते है, कि भगवान का असली स्वरूप भक्ति के द्वारा प्रकट होता है और राधा उस भक्ति की सर्वोच्च मूर्ति हैं। जब हम राधा का नाम लेते हैं तो हम अपने भीतर प्रेम और समर्पण को जगाते हैं और जब उस भाव के साथ कृष्ण का नाम लिया जाता है तो वह सच्ची पुकार बन जाती है। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण के नाम के आगे राधा का नाम लेना चाहिए। श्रीकृष्ण और राधा का संबंध एक नारी और पुरुष का नहीं बल्कि आत्मा और परमात्मा का है। श्रीकृष्ण भगवान हैं, तो राधा उनकी सर्वोच्च भक्त है। इसलिए जब राधारानी का नाम पहले लिया जाता है तो इसका अर्थ होता है कि, परमात्मा तक पहुंचने के लिए हमें पहले भक्ति और प्रेम का सहारा लेना पड़ता है। बिना भक्ति के भगवान तक पहुंचना असंभव है। भक्तों की आराधना से श्रीकृष्ण तब ही खुश होते है जब भक्त प्रीति औऱ समर्पण से उनका अनुसरण करते है। । राधा रानी ने अपने जीवन में कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण और निष्काम प्रेम दिखाया। उनके प्रेम में कोई स्वार्थ नहीं था। राधा ने कभी कृष्ण से कुछ मांगा नहीं बल्कि हर पल केवल उनका स्मरण और आराधना की। यही वजह है कि श्रीकृष्ण का नाम राधा नाम के बिना अधूरा है।
पुराणों ही नहीं, वेदों में भी है राधा रानी का गुणगान
ऋषि वेद व्यास ने भागवत की रचना की, लेकिन उसमें राधा का उल्लेख नहीं है, तो वेद व्यास की लेखनी से भागवत ही नहीं, कई अन्य पुराण भी निकले हैं, जिनमें उन्होंने राधा रानी का गुणगान किया है। पद्म पुराण में कहा गया है, हजारों लक्ष्मी राधा के ही विस्तार हैं, जो उनसे प्रकट हुई हैं। नारद पुराण में राधा रानी के बायीं ओर से महालक्ष्मी के प्रकट होने की बात है। आदि पुराण में वेद व्यास कहते हैं कि राधा शाश्वत हैं। मत्स्य पुराण में कहा गया है कि रुक्मिणी तो द्वारिका में रहती हैं, लेकिन राधा सदैव वृन्दावन में रहती हैं। देवी भागवत पुराण में सीख दी गई है कि श्रीकृष्ण से पहले राधा नाम का उच्चारण करें। ब्रह्म वैवर्तक पुराण के अनुसार श्रीकृष्ण राधा के पुरुष रूप हैं, और अंत में, वेदों में भी राधा जी का उल्लेख है। ऋग्वेद में उल्लेख है कि मैं वृषभानु (राधा के पिता) की पुत्री को प्रणाम करता हूं । राधिकोपनिषद में कहा गया है कि राधा वह सत्ता हैं, जिनके चरण कमलों की धूल को जगत के स्वामी अपने मस्तक पर धारण करते हैं।– लेखिका- नमिता त्रिपाठी, जबलपुर
