भाषा बाधा के बीच न्याय का संदेश : इलाहाबाद हाईकोर्ट से विदा होते हुए भावुक हुए न्यायमूर्ति डोनाडी रमेश

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प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट से स्थानांतरण के बाद आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय लौट रहे न्यायमूर्ति डोनाडी रमेश ने अपने विदाई भाषण में भाषा संबंधी चुनौतियों और उनसे मिली सीख को भावुक शब्दों में साझा किया। जुलाई 2023 से इलाहाबाद हाईकोर्ट में कार्यरत रहे न्यायमूर्ति रमेश ने कहा कि हिंदी में प्रवाह की कमी उनके लिए सबसे बड़ी व्यक्तिगत सीमा थी।

अधिवक्ताओं द्वारा तेज़ और बारीक हिंदी में बहस करने पर उन्हें कई बार तर्क समझने के लिए अधिक प्रयास करना पड़ा या दोहराने का अनुरोध करना पड़ा। उन्होंने स्वीकार किया कि भाषा की इस बाधा के कारण कई फैसलों के मसौदे तैयार करने में देरी भी होती थी, फिर भी उन्होंने अधिवक्ताओं के धैर्य और शिष्टाचार की सराहना करते हुए कहा कि बार ने सुनिश्चित किया कि तर्क स्पष्ट हों। 

यही सहयोग मेरी सबसे बड़ी ताकत बना। उन्होंने बताया कि अदालत के रिकॉर्ड और संवाद मुख्यतः हिंदी में होते थे, जबकि फैसले अंग्रेज़ी में लिखे जाते थे। ऐसे में अनुवाद के दौरान किसी कानूनी बारीकी के छूटने से बचना उनके लिए जिम्मेदारी थी, बोझ नहीं। न्यायालय के कर्मचारियों के सहयोग को याद करते हुए उन्होंने कहा कि रजिस्ट्री और स्टाफ ने भाषा की दूरी को पाटने में हर संभव मदद की। 

न्यायमूर्ति रमेश ने यह भी स्वीकार किया कि भाषा की यह बाधा सामाजिक जीवन में भी महसूस होती थी, लेकिन साथी न्यायाधीशों ने कभी अलगाव का अनुभव नहीं होने दिया। उन्होंने कहा कि एक वादी किसी खास भाषा में निर्णय नहीं चाहता, वह निष्पक्षता और राहत चाहता है। भाषा माध्यम है, न्याय संदेश है।

उन्होंने भारतीय न्याय प्रणाली की विविधता और एकता को अपनी सबसे बड़ी सीख बताया। हर उच्च न्यायालय की भाषा और संस्कृति अलग है, लेकिन सभी मिलकर संविधान के तहत एक प्रणाली बनाते हैं। न्याय की कोई भाषा नहीं, उसका सार सार्वभौमिक है। अंत में न्यायमूर्ति रमेश की यह साफगोई न केवल व्यक्तिगत अनुभव का बयान थी, बल्कि न्यायपालिका में भाषा और न्याय के गहरे संबंध पर एक महत्वपूर्ण विचार भी प्रस्तुत करती है।

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