IIM Lucknow का दावा- अनिवार्य CSR खर्च से कंपनियों पर बढ़ सकता है वित्तीय बोझ
लखनऊ। देश में कंपनियों पर कानूनन लागू किया गया सीएसआर (कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व) खर्च निवेशकों की नजर में जोखिम बढ़ा सकता है। जिसका सीधा असर यह होता है कि कंपनियों को शेयर बाजार से पैसा जुटाने में ज्यादा लागत चुकानी पड़ सकती है। भारतीय प्रबंधन संस्थान लखनऊ (आईआईएम लखनऊ) द्वारा किए गए एक अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है।
यह अध्ययन खास तौर पर गरीबी उन्मूलन से जुड़े सीएसआर खर्च पर केंद्रित है। शोध में यह देखा गया कि जब कंपनियां मजबूरी में सीएसआर पर खर्च करती हैं, तो निवेशक इसे कंपनी के फायदे के बजाय एक अतिरिक्त बोझ मानते हैं। इस कारण निवेशकों का भरोसा कुछ हद तक कम होता है और वे ज्यादा मुनाफे की मांग करते हैं।
यह शोध अंतरराष्ट्रीय पत्रिका जर्नल ऑफ एकाउंटिंग इन इमर्जिंग इकोनॉमिक्स में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन को आईआईएम लखनऊ के प्रोफेसर सेशादेव साहू और उनकी शोध छात्रा डॉ. सुकन्या वाधवा ने मिलकर किया है। शोध के लिए वर्ष 2014 से 2020 के बीच 484 भारतीय कंपनियों के आंकड़ों का अध्ययन किया गया। इन कंपनियों ने कंपनी अधिनियम 2013 के तहत गरीबी हटाने से जुड़े सीएसआर कार्यों पर खर्च किया था।
शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि इस खर्च को निवेशक किस नजर से देखते हैं और इसका कंपनियों की आर्थिक स्थिति पर क्या असर पड़ता है। अध्ययन में पाया गया कि जिन कंपनियों ने गरीबी उन्मूलन पर अधिक सीएसआर खर्च किया, उनसे निवेशकों ने ज्यादा रिटर्न की अपेक्षा की।
इसका मतलब है कि अनिवार्य सीएसआर खर्च कंपनियों की इक्विटी लागत बढ़ा देता है। निवेशक इसे समाज सेवा से ज्यादा एक मजबूरी मानते हैं। हालांकि, सेवा क्षेत्र की कंपनियों के मामले में स्थिति थोड़ी अलग पाई गई। इन कंपनियों में मौजूदा साल का सीएसआर खर्च निवेशकों को सकारात्मक संकेत देता है और उनकी इक्विटी लागत घटती है।
इसका कारण यह है कि सेवा क्षेत्र में भरोसा, छवि और प्रतिष्ठा बहुत मायने रखती है। प्रोफेसर सेशादेव साहू के अनुसार, अगर कंपनियां सीएसआर को सिर्फ कानून की मजबूरी न मानकर अपनी सोच और कामकाज से जोड़ें, तो इससे न सिर्फ समाज को फायदा होगा बल्कि कंपनियों को भी लंबे समय में लाभ मिल सकता है। अध्ययन यह संदेश देता है कि ईमानदारी से किया गया सीएसआर खर्च समाज और उद्योग दोनों के लिए फायदेमंद हो सकता है।
