इथेनॉल बनेगा भारत की नई ऊर्जा क्रांति? किसानों की आय, रोजगार और पर्यावरण के बीच भविष्य की बड़ी तस्वीर

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Published By Muskan Dixit
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गन्ने से बढ़ता इथेनॉल उत्पादन खोल रहा नए उद्योगों के द्वार, पेट्रोल पर निर्भरता घटाने की तैयारी; विशेषज्ञों ने भूजल दोहन और खाद्य सुरक्षा पर भी जताई चिंता

प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए इथेनॉल भारी संभावनाएं लेकर उभर रहा है। चीनी मिलों में अब गन्ने के रस से चीनी उत्पादन ही नहीं, बल्कि इथेनॉल उत्पादन पर भी खासा जोर दिया जा रहा है। वजह यह है कि सस्ता होने के कारण इथेनॉल का उपयोग अब पेट्रोल के विकल्प के तौर पर सामने आया है। पेट्रोल में अभी 20 प्रतिशत इथेनॉल का इस्तेमाल हो रहा है। केंद्र सरकार ने पर्यावरण संरक्षण और कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने के लिए इथेनॉल आधारित ईंधन ई-85 और फ्लेक्स फ्यूल वाहनों को लांच किया है। ऐसे में आने वाले समय में उत्तर प्रदेश समेत पूरे देश में इथेनॉल आधारित दुपहिया और चौपहिया वाहनों का बाजार बढ़ने की संभावना है। इथेनॉल के उपयोग से जहां पर्यावरण संरक्षण और ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ावा मिलेगा, वहीं किसानों की आय में खासी बढ़ोतरी भी हो सकेगी। इसके अलावा इथेनॉल उद्योग में युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर उपलब्ध हो सकेंगे। साथ ही, कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता में कमी आएगी। इसके साथ ही इसका एक स्याह पक्ष यह भी है कि गन्ने में ज्यादा भूगर्भ जल दोहन से भविष्य में जल के संकट पर भी सवाल भी खड़ा हो रहे हैं।

पारंपरिक तौर पर अभी प्रदेश के 75 जिलों में से 45 जिलों में प्रमुख तौर पर गन्ने का उत्पादन होता है। गन्ना उत्पादन ग्रामीण व्यवस्था के लिए रीढ़ है। इससे करीब 45 लाख किसानों को सीधे रोजगार मिला हुआ है, जो उनकी आजीविका का साधन है। सबसे ज्यादा गन्ने का उत्पादन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में होता है, जबकि जिलों में सबसे अधिक उत्पादन मध्य क्षेत्र के लखीमपुर खीरी में हो रहा है।

गन्ना उत्पादन से जुड़े जानकारों का कहना है कि अब चीनी मिलें चीनी उत्पादन के साथ ही इथेनॉल उत्पादन पर भी फोकस कर रही हैं। इथेनॉल उत्पादन से किसानों के जीवन स्तर में सुधार हो सकेगा, क्योंकि उन्हें समय पर गन्ने के बकाये मूल्य भुगतान हो सकेगा। वर्तमान में चीनी मिलें गन्ना किसानों को समय पर भुगतान नहीं कर रही हैं। इसको लेकर सरकार स्तर पर सख्ती की जाती है। शासन के निर्देश पर जिला प्रशासन उन्हें रिकवरी प्रमाण पत्र जारी करते हैं, तब जाकर भुगतान संभव हो पाता है। शासन की सख्ती के कारण अब तक बकाये का लगभग नब्बे प्रतिशत रकम 31,226 करोड़ रुपये का भुगतान किया जा चुका है। जानकारों का कहना है कि भविष्य में इथेनॉल का उपयोग बढ़ेगा, तो चीनी मिलों को काफी लाभ होगा। ऐसे में चीनी मिलें किसानों को समय पर गन्ने के मूल्य का भुगतान कर सकेंगी।

इथेनॉल का उत्पादन

वर्ष 2025-26 में प्रदेश में 229 करोड़ लीटर इथेनॉल का उत्पादन हुआ, जबकि चालू वर्ष में 15 करोड़ लीटर इथेनॉल का उत्पादन हो चुका है। वर्ष 2016-17 में इथेनॉल का उत्पादन 42 करोड़ लीटर था। इससे साफ है कि चीनी मिलों में इथेनॉल उत्पादन तेजी से बढ़ता जा रहा है। जानकारों के अनुसार खेतों में अच्छी गुणवत्ता का गन्ना लगाने के कारण उसमें रस ज्यादा निकल रहा है। यह चीनी उत्पादन और इथेनॉल उत्पादन दोनों के लिए बेहतर साबित हो रहा है। सरकार की ओर से चलाई जा रही योजनाओं के कारण किसान अब अच्छी किस्म का गन्ने की बुवाई के लिए लगातार जागरूक हो रहे हैं। इससे उनकी आय बढ़ने की संभावना बढ़ती जा रही है।

देश को होगी सालाना 1016 करोड़ लीटर इथेनॉल की जरूरत

केंद्र सरकार के इथेनॉल मिश्रण (ई-20) का लक्ष्य पूरा करने के लिए देश में सालाना 1016 करोड़ लीटर इथेनॉल की जरूरत होगी, क्योंकि नए उद्योग के लिए बड़ा बाजार तैयार हो रहा है। युवाओं के लिए रोजगार के अवसर की संभावनाएं भी बढ़ रही हैं। इथेनॉल प्लांट स्थापित करने के लिए सरकार सस्ते ब्याज दर पर ऋ ण व अन्य वित्तीय सहायता उपलब्ध करा रही है। भविष्य में इथेनॉल का उपयोग बायो-प्लास्टिक निर्माण में भी किया जाएगा, जिससे लोगों को सिंगल यूज प्लास्टिक का विकल्प मिलेगा।

टूटे चावल से भी बन रहा इथेनॉल

गन्ने के अलावा अब कृषि अवशेषों (पराली), मक्का, खराब और टूटे चावल आदि से भी एथेनॉल का उत्पादन हो रहा है। किसानों को उनके कचरे का भी दाम मिलना शुरू हो गया है। इससे किसानों की आय में बढ़ोतरी हो रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में नए डिस्टिलरी प्लांट लगने भविष्य में स्थानीय स्तर पर रोजगार मिलने की संभावनाएं बढ़ गई हैं। केंद्र सरकार द्वारा टूटे चावल से इथेनॉल बनाने की नीति पर बहस छिड़ गई है। केंद्र सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली में बदलाव कर मुफ्त राशन में चावल की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत कर दी है। इथेनॉल उत्पादकों के लिए भारतीय खाद्य निगम के माध्यम से रियायती दर पर टूटे चावल की नीलामी व खरीद की व्यवस्था की गई है। इससे मुफ्त में राशन पाने वाले गरीबों के खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम प्रभावित होने की आशंका खड़ी हो गई है।

बेहतर किस्मों से बढ़ रहा रस, बढ़ रही कमाई 

गन्ना विकास विभाग और कृषि वैज्ञानिकों के प्रयासों का असर अब खेतों में भी नजर आ रहा है। किसान अब अधिक उपज देने वाली और बेहतर रिकवरी वाली किस्मों को अपना रहे हैं। गन्ने की इन किस्मों में रस की मात्रा अधिक होती है, जिससे चीनी और इथेनॉल दोनों का उत्पादन बढ़ता है। गन्ने में मौजूद शर्करा ही इथेनॉल उत्पादन का आधार है। जितनी बेहतर गुणवत्ता का गन्ना होगा, उतनी ही अधिक मात्रा में इथेनॉल तैयार किया जा सकेगा। यही कारण है कि अब चीनी मिलें भी किसानों को उन्नत किस्मों की खेती के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं। प्रदेश में गन्ना उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र लखीमपुर-खीरी बना हुआ है, जहां पिछले पेराई सत्र में 316 लाख टन से अधिक गन्ने का उत्पादन हुआ। बिजनौर, सीतापुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ और सहारनपुर भी शीर्ष उत्पादक जिलों में शामिल हैं। इन क्षेत्रों में नई डिस्टिलरी और इथेनॉल इकाइयों के विस्तार की योजनाएं चल रही हैं। यदि यह विस्तार गति पकड़ता है, तो गन्ना उत्पादक जिलों में कृषि आधारित उद्योगों का नया नेटवर्क विकसित हो सकता है।

गांवों में रोजगार का नया अवसर

इथेनॉल उद्योग के विस्तार का असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा। नई डिस्टिलरी, भंडारण केंद्र, परिवहन और तकनीकी सेवाओं की जरूरत से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं। राज्य सरकार के अफसरों का कहना है कि यदि गन्ना उत्पादक जिलों में इथेनॉल आधारित उद्योग विकसित होते हैं, तो बड़ी संख्या में स्थानीय युवाओं को अपने जिले में ही रोजगार मिल सकेगा।

पर्यावरण के लिए भी फायदेमंद 

इथेनॉल को जैव ईंधन माना जाता है। पेट्रोल में इसके उपयोग से कार्बन उत्सर्जन कम करने में मदद मिलती है। यह पूरी तरह प्रदूषण मुक्त ईंधन नहीं है, लेकिन पारंपरिक पेट्रोल की तुलना में अपेक्षाकृत स्वच्छ विकल्प माना जाता है। यही कारण है कि केंद्र सरकार पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण बढ़ाने की दिशा में लगातार काम कर रही है।

पेराई सत्र 2024-25

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पिछले पांच सालों में गन्ने से चीनी का उत्पादन

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आटोमोबाइल प्रतिनिधि बोले

वर्तमान में बड़े शहरों दिल्ली, मुंबई आदि में इथेनॉल से चलने वाले वाहन बाजार में आ गए हैं। पेट्रोल के बजाय इथेनॉल से चलने वाले इंजन अलग से लग रहे हैं। आने वाले महीनों में छोटे शहरों में भी ऐसे वाहन आने की संभावना बढ़ गई है, क्योंकि पेट्रोल महंगा होने के कारण अब लोग सस्ता ईंधन वाले वाहन पसंद कर रहे हैं।
- पंकज अग्रवाल, बांके बिहारी आटो प्राइवेट लिमिटेड, बरेली

इथेनॉल से अभी आ रही वाहनों में दिक्कतें पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण से वाहनों में अभी दिक्कतें आ रही हैं। वाहनों के स्टार्ट होने में ‘मिसिंग’ हो रही है। पहले वाहनों में ‘कार्बोरेटर’ लगे होते थे। इस दौरान पेट्रोल में अगर कचरा होता था, तो वहीं रुक जाता था। वर्तमान में वाहनों में कार्बोरेटर न होने से ईंधन सीधे इंजन में चला जा रहा है। इससे वाहनों में दिक्कतें हो रही हैं। पर इथेनॉल के अनुकूल इंजन होने पर यह कारगर सिद्ध होगा।
-सद्दाम हुसैन, टीवीएस हिन्दुस्तान आटो सेल्स, बरेली

चीनी मिल प्रतिनिधियों की राय 

नए डिस्टिलरी प्लांट लगने से स्थानीय युवाओं को मिलेगा रोजगार: इथेनॉल का पेट्रोल के तौर पर प्रयोग होने से इस क्षेत्र में संभावनाएं बढ़ गई हैं। पिपराइच चीनी मिल में भी इथेनॉल उत्पादन लगाने के लिए प्लांट लगाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। इथेनॉल प्लांट लगने से स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर निश्चित तौर पर मिलेंगे। इससे किसानों को समय पर उनके गन्ना मूल्य का भुगतान हो सकेगा।
-जगत राजपूत, प्रधान प्रबंधक, पिपराइच चीनी मिल, गोरखपुर

इथेनॉल पर भविष्य में व्यापक संभावनाएं:  प्रदेश में इथेनॉल को लेकर बाजार में व्यापक संभावनाएं हैं। पेट्रोल के तौर पर इस्तेमाल से इसकी मांग आगे बढ़ने की संभावना है। मांग बढ़ेगी तो इथेनॉल उद्योग का विकास होगा। इससे युवाओं को ज्यादा रोजगार मिल सकेंगे। किसानों को भी समय पर गन्ना मूल्य का भुगतान हो सकेगा।
-जय प्रकाश, महाप्रबंधक, नानौता सहकारी चीनी मिल,सहारनपुर

सरकार को और प्रयास करने की जरूरत: बजाज ग्रुप की चीनी मिलों में सबसे ज्यादा इथेनॉल का उत्पादन हो रहा है, पर अभी मांग ज्यादा नहीं है। सरकार अगर इथेनॉल आधारित वाहनों को बढ़ावा देने पर और प्रयास करे, तो भविष्य में इथेनॉल का कारोबार बढ़ जाएगा।
-पीएन सिंह, यूनिट हेड, बजाज चीनी मिल कुंदरखी, गोंडा

इथेनॉल उद्योग में संभावनाएं बहुत: अभी वाहनों में 20 प्रतिशत इथेनॉल का प्रयोग हो रहा है। जैसे-जैसे तकनीक बढ़ेगी, इसका प्रतिशत बढ़ता जाएगा। ऐसे में इथेनॉल उद्योग बढ़ने की पूरी संभावनाएं हैं। इससे रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे, किसानों को भी लाभ होगा।
- डॉ. एचके त्रिपाठी, डीसीएम श्रीराम चीनी मिल, लखीमपुर खीरी

भूमिगत जलदोहन होगी बड़ी समस्या

इथेनॉल उत्पादन देश की समृद्धि का एक बहुत अच्छा रास्ता बना है, क्योंकि इससे वर्ष भर चीनी मिलें इथेनॉल का उत्पादन कर सकती है, पर यह अपने साथ पर्यावरण और भूगर्भ जल को लेकर समस्या भी साथ लेकर चलता है। गन्ना अत्यधिक पानी की आवश्यकता वाली फसल है, जो चीनी उत्पादन के लिए उगाई जाती है, लेकिन इथेनॉल उत्पादन के कारण नए-नए क्षेत्रों में भी गन्ने की खेती का प्रचार-प्रसार बढ़ा है और आने वाले समय में और ज्यादा बढ़ने की संभावना है। इस कारण  परिस्थितिक असंतुलन की आशंका है। ऐसे में इथेनॉल का उत्पादन केवल गन्ना आधारित फसलों पर ही न रखा जाए। इसके लिए मीठी मक्का और ज्वार को लेकर इथेनॉल उत्पादन किया जाए। मृदा जल संरक्षण और भूगर्भ जल दोहन को नियंत्रित करने के साथ-साथ गन्ना, मीठी ज्वार व मीठी मक्का केवल उन्हीं क्षेत्रों में उगाई जाने के प्रयास किए जाने चाहिए, जिन क्षेत्रों के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा ये फसलें अनुमोदित हैं। नए क्षेत्रों में इनका अधिक प्रचार करने के कारण भूमिगत जलदोहन बड़ी समस्या के साथ कृषि उत्पादन को प्रभावित करेगा।
-कुलदीप बिश्नोई, कृषि विशेषज्ञ बरेली

- रमेश चन्द्र, वरिष्ठ पत्रकार

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