हल्द्वानी: कोरोना संक्रमण से इस बार पहाड़ी फलों का स्वाद फीका

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हल्द्वानी, अमृत विचार। कोरोना संक्रमण में पहाड़ों से आने वाले फलों का स्वाद फीका नजर आ रहा है। कोराना काल जहां पिछले साल फलों की पैदावार अच्छी होने बाद भी फलों की सप्लाई ठप रही। इस कारण काश्तकारों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। वहीं इस साल भी फल कारोबारियों को भारी नुकसान झेलना पड़ सकता …

हल्द्वानी, अमृत विचार। कोरोना संक्रमण में पहाड़ों से आने वाले फलों का स्वाद फीका नजर आ रहा है। कोराना काल जहां पिछले साल फलों की पैदावार अच्छी होने बाद भी फलों की सप्लाई ठप रही। इस कारण काश्तकारों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। वहीं इस साल भी फल कारोबारियों को भारी नुकसान झेलना पड़ सकता है। बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि से पहाड़ी फलों को काफ़ी नुकसान पहुंचा है। अप्रैल में हुई ओलावृष्टि से जहां फलों और फूलों में दाग पड़ गये।

इससे फलों की पैदावार ठीक नहीं हो रही है। फलों में दाग पड़ने की वजह से बाजारों में फलों का उचित दाम नहीं मिल पा रहा है। और अन्य राज्यों में माल नहीं पहुंच पा रहा है। जिले में रामगढ़, मुक्तेश्वर, धारी, नैनीताल ऐसे इलाके है, जहां आडू,खुमानी,पुलम, सेब और आलू का बेहतर उत्पादन होता है। कोरोना संक्रमण में पहाड़ से आने वाला फल बड़ी मंडियों तक नहीं पहुंच पा रहा है। इसके फल व्यापारियों को छोटी आड़त में ही माल देना पड़ रहा है। जिससे व्यापारियों को अच्छी लागत नहीं मिल पा रही है।

रामगढ़ के कृषक जितेंद्र सिंह दरम्वाल ने बताया कि आडू के दाम बाजारों में 50 रुपये प्रति किलो बिक रहा है। कोरोना काल से पहले से आडू की पेटी 600 से 700 रुपये बिकती थी, अब वह 400 से 500 रुपये में बिक रही है। बाजार में फलों के सही दाम नहीं मिलने से काश्तारों की लागत भी नहीं आ पा रही है। कोरोना की वजह से फलों की सप्लाई पर भी खासा असर देखने को मिल रहा है।

रामगढ़ के फल मुंबई, दिल्ली तक सप्लाई होता है नैनीनात जिले के फल

फलों के लिए मशहूर मुक्तेश्वर, रामगढ़ के फलों की मांग दिल्ली, मुंबई तक है। यहां से अन्य राज्यों में जाने फल 2 से 3 हजार रुपये प्रति पेटी बेची जाती है। लेकिन संक्रमण के कारण ट्रांसपोर्ट कम से होने काश्ताकारों को भारी नुकसान हो रहा है। इससे ट्रांसपोर्ट कम है लिहाजा कास्तकारों की आर्थिकी पर बहुत बुरा असर पड़ा है। कास्तकारों की माने तो अप्रैल में हुए ओलावृष्टि से फलों को नुकसान हुआ है, और जो थोड़ा बहुत फसल है उसी की पैकिंग हो रही है, लेकिन फलों की लागत बचाना मुश्किल हो गया है।

 

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