International Nurses Day : रीता और इंदू सक्सेना ने विपरीत परिस्थितियों में भी कायम रखा सेवा का जज्बा

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आदित्य कांत शर्मा/अमृत विचार। द लेडी विद द लैंप (दीपक वाली महिला) के नाम से प्रसिद्ध फ्लोरेंस नाइटिंगेल का जन्म 12 मई 1820 को हुआ था। समृद्ध परिवार में जन्मी फ्लोरेंस ने सेवा का मार्ग चुना और चिकित्सा क्षेत्र में उतर गईं। उनकी सेवा व समर्पण को देखकर 12 मई को अंतर्राष्ट्रीय नर्स दिवस मनाये …

आदित्य कांत शर्मा/अमृत विचार। द लेडी विद द लैंप (दीपक वाली महिला) के नाम से प्रसिद्ध फ्लोरेंस नाइटिंगेल का जन्म 12 मई 1820 को हुआ था। समृद्ध परिवार में जन्मी फ्लोरेंस ने सेवा का मार्ग चुना और चिकित्सा क्षेत्र में उतर गईं। उनकी सेवा व समर्पण को देखकर 12 मई को अंतर्राष्ट्रीय नर्स दिवस मनाये जाने का निर्णय हुआ। तब से लेकर अब तक चिकित्सा के क्षेत्र में महिलाएं अपना योगदान दे रही हैं। उनके सेवा कार्य को लोग भुला नहीं पाते। कोरोना काल में भी डॉक्टरों के साथ-साथ नर्सों ने भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। इस दौरान कई ने कोरोना की चपेट में आकर जान तक गंवा दी थी। अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस पर ऐसी दो महिला नर्सों से अमृत विचार की टीम ने बात की और उनके अनुभव को साझा किया।

नगर के संयुक्त चिकित्सालय से 2015 में सेवानिवृत रीता सक्सेना ने बताया कि वह 1981 से चिकित्सा क्षेत्र में आ गई थीं। उनके द्वारा हजारों महिलाओं का प्रसव कराया गया है। प्रसव के दौरान कोई भी अप्रिय घटना नहीं हुई। उन्होंने एक वाक्या साझा किया कि वर्ष 1983 में जब उनका बेटा पांच माह का था, तब उनके द्वारा एक सरकारी विभाग में तैनात बीडीओ की डिलिवरी कराई गई थी। ऐसे में बच्चें को बराबर बिस्तर पर लेटाकर उन्होंने सकुशल प्रसव का कार्य किया, जिसके बाद से उनकी उक्त महिला से अच्छी दोस्ती हो गई। आगे उन्होंने बताया कि 34 वर्ष का सेवा कार्य उन्होंने पूरे मन से किया। लोग आज भी उन्हें जब मिलते हैं, तो सम्मान देते हैं। उन्होंने सेवानिवृत्त व शुगर पीड़ित होने के बाद भी कोरोना काल में भी अपना सेवा कार्य जारी रखा, वो आज भी टीकाकरण के रूप में चल रहा है।

संयुक्त चिकित्सालय चन्दौसी में तैनात नर्स इंदू सक्सेना ने बताया कि उन्होंने अपने काम को हमेशा लगन व मेहनत से किया, किसी को कोई परेशानी नहीं होने दी। अभी तक कितने प्रसव करा चुकी हूं याद नहीं। हां अभी तक किसी भी प्रसव में किसी महिला को कोई परेशानी नहीं होने दी है। एक वाक्या उनके द्वारा बताया गया कि रामनगर उत्तराखंड में तैनाती के दौरान एक केस ऐसा आया था जो आज भी जेहन से नहीं निकलता है। अस्पताल में एक गर्भवती महिला आई थी। वह एड्स पीड़ित थी उसकी पूरी लगन के साथ बिना भेदभाव के सेवा की थी। बाद में उसे हल्द्वानी के सुशीला तिवारी हॉस्पिटल रेफर कर दिया गया था। वह स्वयं भी उत्तराखंड से स्थानांतरण कराकर चन्दौसी आ गई, 24 वर्ष की सेवा पूरी हो गई है, अभी छह वर्ष की सेवा शेष है। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि उनके हाथ से कुछ बुरा नहीं हो। जैसे अभी तक सेवा भाव से कार्य करती आई हूं, उसी प्रकार से करती रहूंगी।

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