International Women's Day: अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के पूर्व हिंदी दैनिक 'अमृत विचार' कार्यालय में हुई परिचर्चा
कार्यालय संवाददाता, लखनऊ/अमृत विचार। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के पूर्व हिंदी दैनिक के अमृत विचार कार्यालय में महिला सशक्तिकरण पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया। इस परिचर्चा में विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाओं ने कहा कि इस मुद्दे पर शिद्दत से सोचा जाना चाहिए कि महिलाएं क्या करें, जिससे वह सशक्त हो सकें। परिचर्चा में शिक्षक, चिकित्सक, व्यापारी, रंगकर्मी, योग प्रशिक्षक, आत्मरक्षा प्रशिक्षक, फैशन डिजाइनर से लेकर कोरियोग्राफी सिखाने वाली महिलाएं शामिल हुईं।

व्यापार जगत से जुड़ी अनिला अग्रवाल ने कहा कि महिला सशक्तिकरण पर पुलिस और प्रशासन को गंभीरता से सोचना चाहिए। अगर लड़कियों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम रखे तो महिलाओं में आत्मविश्वास बढ़ेगा और सशक्तिकरण की ओर उठा पहला और मजबूत कदम होता है।
रोजी मिश्रा रंगकर्मी हैं। वह रंगमंच की बारीकियां सिखाती हैं। उनका कहना है कि रंग कर्म आसान काम नहीं है। रंगमंच की ओर आकर्षित होने वाली लड़कियों को पहला सबक वह यही सिखाती हैं कि यह चकाचौंध वाली जगह नहीं है। इसमें जाकर यह समझना पड़ता है कि हम क्या हैं।

डॉ. इंदु सुभाष ने महिलाओं को सिखाया कि महिलाओं को सशक्त बनाना है तो उन्हें झूठी शिकायतों का चलन बंद करना होगा। उन्होंने बताया कि 1090 पर आने वाली महिलाओं की शिकायतों में अधिकांश झूठी होती हैं। जिस महिला की शिकायत झूठी मिले उसका सामाजिक बहिष्कार किया जाना चाहिए। शादी के समय शपथ पत्र पर दहेज़ में दिए जा रहे सामान की सूची पर हस्ताक्षर कराएं जाएं ताकि दहेज की झूठी शिकायतों पर लगाम लग सके।
उन्होंने महिलाओं से कहा कि संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग बंद कीजिये। इन कानूनों से महिला सशक्त नहीं होती है। दहेज़ एक्ट में दूसरी महिला जेल जाती है तो फिर वह सशक्त कहां से हो पायेगी। उन्होंने पूछा कि जब हम शादी में जज और थानेदार को नहीं बुलाते तो फिर शादी में समस्या आती है तो फिर इनके पास क्यों जाते हैं। उनके पास क्यों नहीं जाते जिन बुजुर्गों के सामने शादी हुई थी।

महिलाओं ने इस परिचर्चा में खुले दिल से बात की और वह तरीके तलाशने की कोशिश की जो वास्तव में महिलाओं को सशक्त बना सकें। महिलाओं ने अमृत विचार से कहा कि जो सिलसिला आज शुरू किया है उसे आगे भी जारी रखा जाए ताकि एक ऐसा प्लेटफार्म तैयार हो सके जिस पर महिलायें अपनी बात खुले दिल और दिमाग से कर पाएं।
अमृत विचार कार्यालय में आई महिलाओं ने कहा....
महिला सशक्त होगी तो पूरा समाज सशक्त होगा। नव अंशिका फाउंडेशन ने इसी सोच के साथ मार्च के पूरे महीने को महिलाओं को समर्पित किया है। हर बुधवार को किसी एक वर्ग की महिलाओं के सम्मान की श्रंखला चल रही है। पिछले हफ्ते हमने घरों में काम करने वाली महिलाओं को सम्मानित किया और उन्हें कुर्सियों पर बिठाया तो उनकी आंखों से खुशी में आंसू निकल पड़े। सम्मान का यह सिलसिला पूरे मार्च चलेगा... नीशू त्यागी अध्यक्ष, नव अंशिका फाउंडेशन।
समाज के सम्पूर्ण विकास के लिए नारी का सक्षम और आत्मनिर्भर होना बहुत जरूरी है। सरकार महिलाओं के लिए तमाम योजनायें बना रही है लेकिन अगर योजनाओं का क्रियान्वयन ही न हो पाए तो कोई फायदा नहीं है। महिलाओं के सशक्त होने के लिए यह भी जरूरी है कि बेटियां अपना जो भी लक्ष्य तय कर रही हैं, वह खुद भी उस लक्ष्य को पहचानें और परिवार भी उस लक्ष्य को पूरा कराने में मदद करें ...सुमिता तिवारी, एडवोकेट।
झुग्गी-झोंपड़ी, अनाथालय, नवोदय विद्यालय और कस्तूरबा विद्यालयों से लेकर शहरी व ग्रामीण क्षेत्र की बालिकाओं को रंगमंच के माध्यम से शिक्षा के प्रति जागरूक करने की कोशिश करती रहती हूं। रंगमंच की शिक्षा देने के लिए कई जगहों पार जाने का मौका मिला है। एक गांव की बालिका को उसके शराबी पिता ने शराब खरीदने के लिए अपनी उम्र के आदमी के हाथ बेच दिया। वह भी शराबी था। मासूम सी बच्ची पर खूब अत्याचार हुए। वह ससुराल से भागकर अपने स्कूल आई तो डरे हुए स्कूल प्रबंधन ने भी मदद के नाम पर हाथ खड़े कर दिए। तब हमने और हमारे साथियों ने पुलिस के पास ले जाकर एफआईआर लिखाई। महिला सशक्त तभी हो सकती है जबकि उसके आसपास के लोग, खासकर उसका स्कूल मदद को हाथ बढ़ाये ...रोजी मिश्रा, सचिव, रंगनाद पूर्व छात्रा (भारतेन्दु नाट्य अकादमी)।
महिला सशक्तिकरण का अर्थ है महिलाओं का स्वावलम्बन। महिलाओं के लिए स्वावलम्बन के सही मायने यह हैं कि महिलाओं को वित्तीय स्तर पर इतना मजबूत होना चाहिए कि वह अपने फैसले ले सकें। महिलाओं को अगर सही तरीके से शिक्षा दे दी जाए तो न सिर्फ वह अपने लिए मर्जी का रोजगार ढूंढ सकती हैं बल्कि उनके सामने सुरक्षा के विकल्प भी खुल जायेंगे ...डॉ. अर्चना श्रीवास्तव, एमडी, मेडिसिन।
मेरी सुबह 4 बजे शुरू होती है और मैं रात 9 बजे तक काम करती हूं। मेरे कालेज में 3000 छात्राएं हैं और दो मेरी बेटियां हैं। मेरा ध्यान इन सभी के भविष्य पर है। मैं लखनऊ विश्वविद्यालय के रिजल्ट सेल में एडीशनल सुपरिंटेंडेंट की जिम्मेदारी भी निभाती हूं। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग प्रयागराज और यूपीएससी दिल्ली की परीक्षक भी हूं और पेपर भी सेट करती हूं। इतनी कोशिशों को महिला सशक्तिकरण से जोड़ा जा सकता है। प्रो. रचना श्रीवास्तव, प्रधानाचार्य, एपी सेन मेमोरियल गर्ल्स पीजी कालेज।
मैं स्त्री रोग विशेषज्ञ हूं। कोविड के दौर में भी मैंने आपरेशन जारी रखे। अपने पास आने वाली महिलाओं का न सिर्फ उपचार करती हूं बल्कि उन्हें उनके अधिकार भी बताती हूं। मेरे पास एक महिला अपने चौथे बच्चे के आपरेशन के लिए आई तो पता चला कि लड़का हो जाए इसलिए तीन लड़कियां हो चुकी हैं। मैंने पूछा कि लड़का तुम चाहती हो या परिवार। तो उसने बताया कि परिवार। मैंने उसे जागरूक किया और उसी से परिवार पर दबाव बनवाया कि इस आपरेशन के साथ ही नसबंदी भी करानी होगी... डॉ. मंजू राठौर, पूर्व मुख्य चिकित्सा अधीक्षक, एलबीआरएन हॉस्पिटल, लखनऊ।
मैं छात्रा होने के साथ ही इंटीरियर डिजाइनर का काम भी करती हूं। मैंने देखा है कि मौजूदा सरकार ने लड़कियों के सम्मान में सराहनीय कार्य किये हैं। इस सरकार ने महिलाओं के लिए कई क़ानून भी बनाये हैं. महिला दिवस का आयोजन तो महिलाओं को यह अहसास दिलाने के लिए है कि उनके भी अधिकार होते हैं और उनके हक़ में भी क़ानून हैं...शेफाली सिंह, इंटीरियर डिजाइनर।
छात्राओं को सशक्त बनना है तो अपने लक्ष्य की ओर अडिग होकर बिल्कुल उसी तरह से आगे बढ़ना चाहिए जैसे कि अर्जुन का लक्ष्य सिर्फ मछली की आंख थी। मैं मैराथनर हूं, इस नाते हर महिला को अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने का काम करती हूं. मैं सामाजिक कार्यकत्री भी हूं इस नाते मैं हर गरीब परिवार की महिला को शिक्षा का अधिकार दिलाना चाहती हूं। मेरी कोशिश है कि बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ के नारे पर अमल भी हो...डॉ. क्षितिज शुक्ला, प्राध्यापक (जीव विज्ञान)।
मैं गृहणी हूं लेकिन घर का काम संभालने के साथ-साथ घर के बाहर का काम भी सम्भालती हूं। मैं किसी भी संस्था से नहीं जुड़ी हूं लेकिन समाजसेवा का कोई भी मौका छोड़ती नहीं हूं ...रंजना सिंह, गृहणी
केन्द्रीय विद्यालय अलीगंज की छात्रा हूं। शिक्षा के क्षेत्र में सरकार की योजनाओं से अभिभूत हूं। समाज में अभी भी बहुत से अभिभावक अपनी लड़कियों को नहीं पढ़ाते हैं। मैं ऐसे मां-बाप से कहना चाहती हूं कि वह यह बात समझें कि पढ़ेगा इंडिया तभी तो आगे बढ़ेगा इंडिया। नई शिक्षा नीति बनी है तो उसका लाभ लड़कियों को जरूर मिलना चाहिए...सृष्टि सिंह, छात्रा
जहां चाह वहां राह साबित किया नारी शक्ति ने...
नारी को सशक्त करने की दिशा में सेल्फ डिफेंस की ट्रेनिंग करा उन्हें मजबूत किया गया। कोविड के दौरान मानसिक संतुलन खो चुकी महिलाओं और बच्चियों का रेस्क्यू कराकर उन्हें सुरक्षित जगह रखवाया गया। पांच महिलाएं स्वस्थ हो चुकी हैं। सड़कों पर विक्षिप्त अवस्था में घूम रही महिलाओं, लड़कियों को कपडे़, राशन उपलब्ध करा उन्हें संबल प्रदान किया गया। आज भी शिक्षा के अधिकार के तहत वंचित तीन सौ बच्चों को स्कूली शिक्षा दिलवा उन्हें अपने पैरों पार खड़ा किया गया ...ज्योति खरे, सेक्टर वार्डन, सिविल डिफेंस।
यूं तो कारोबारी घराने से जुड़ी हुई हूं। 25 वर्ष से व्यापार कर अपने साथ नारी शक्ति को जोड़ रखा है। सशक्तिकरण को हम दोहरे रूप में देखते हैं। एक वह जो परिवार के साथ खड़ी होती है, दूसरा इससे इतर वह किसी अन्य फील्ड में महारथ हासिल कर अपनी विधा में परचम लहराती है। इससे वह सामाजिक और आर्थिक दोनों तरह से समृद्ध होती है। तमाम उदाहरण हैं जहां महिला शक्ति ने अपनी अग्रणी भूमिका अदा की है। व्यापारी नेता के रूप में समाज में अलग-अलग कार्य कर महिला उद्यमियों को प्रोत्साहित करना ...अनीला अग्रवाल, अध्यक्ष महिला विंग आदर्श व्यापार मंडल।
महिलाएं अधिकार से पहले कर्तव्य परायण बने। स्त्री पुरुष के बीच प्रतिद्वंदिता का भाव न रहे। स्त्री एक पत्नी, बहन, मां सभी रूपों में सुरक्षित रहे। समाज में लिंगभेद से परे कानूनी व्यवस्था होनी चाहिए। दंड व्यवस्था सम पर आधारित होनी चाहिए। महिला के हर रूप की सुरक्षा हो। दादा-दादी क्लब, गोल्डेन एज क्लब समेत कई संस्थाओें के माध्यम से न्याय दिलाना और टूट रहे परिवारों को परिवार कल्याण विशेषज्ञ के रूप में सलाह देकर उन्हें स्थायित्व का बोध कराना लक्ष्य है ...डॉ. इन्दु प्रकाश, मुख्य सलाहकार भारतीय सेना सेंट्रल कमांड आवा सेल।
महिलाओं को निरोगी काया के लिए प्रोत्साहित कर उन्हें योग के माध्यम से सीधे जोड़ने की कोशिश है। महिलाओं और बच्चों को योगासन सिखा उन्हें स्वस्थ मन के साथ रहने के लिए प्रेरित करना लक्ष्य है। अब योग कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है। इससे न केवल वह अपना शरीर स्वस्थ करती हैं बल्कि घर और परिवार के सदस्यों को भी जोड़ती हैं। यानी महिला सशक्त परिवार के सदस्य सशक्त। ऐसे प्रयास से पीढ़ी दुरुस्त करने का कार्य किया जाता है ...कविता प्रसाद, योग शिक्षिका, भारतीय आदर्श योग संस्थान।
बुन्देलखंडी बच्चों की शिक्षा के लिए विद्यालय का संचालन किया जा रहा है। यही नहीं कई स्वयं सहायता समूह चलाए जा रहे हैं। इनमें ग्रामीणांचलों की महिलाओं को जीवकोपार्जन और धनार्जन के लिए प्रशिक्षित कर उन्हें कमाई का जरिया प्रदान करते हुए उन्हें संबल देने का काम करते हैं जिससे अधिकांश महिलाएं अपने को सशक्त महसूस करती हैं। व्यापारी समाज से जुड़कर व्यापारियों के मुद्दे विभिन्न फोरम में रखती हूं जिससे महिला उद्यमी तो कम से कम परेशान न हों ...नेहा रस्तोगी, महिला मोर्चा अवध क्षेत्र में कार्य।
महिलाओं को प्रोत्साहित कर शिक्षण कार्य से जोड़ना, रोजगार परक शिक्षा दिला उनके हाथों को मजबूत करने की कोशिश होती है। अब योग की तरफ महिलाओं का ध्यान आकर्षित करने का है क्योंकि स्वस्थ शरीर से ही महिला आगे बढ़ सकती है। रोजगार परक शिक्षा और योग मिलकर रोजगार की नई इबारत गढ़ने का प्रयास है। वूमेन की व्याख्या की कहा डब्ल्यू से वंडरफुल वाइफ, ओ से आउट स्टैँडिंग फ्रेंड, एम से मार्वलस सिस्टर, ए से एडारबिल डॉटर, एन से नर्सिंग मदर ...मानसी जायसवाल, योग शिक्षिका।
जीवन के लक्ष्य को केंद्रीत कर आगे बढ़ो। इसी संकल्प के साथ शुरुआत हुई। स्कूल ओनर और बिजनेस वूमेन के रूप में स्थापित होने के बाद अब हर इवेंट में ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को साथ लाकर उन्हें प्रोत्साहित किया जाता है। महिलाओं को सबसे पहले अपना लक्ष्य तय करना चाहिए और उसके बाद वह धीरे-धीरे उसे पाने की कोशिश करें। तभी रास्ता निकलता है। कह सकते हैं कि जहां चाह वहां राह ...रीमा अग्रवाल, बिजनेस वूमेन एंड एसोसिएट एडीटर मीडिया ग्रुप।
शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है लेकिन आज भी कहीं न कहीं महिलाओं को काम करने में समस्या आती है। वर्तमान में बेसिक शिक्षा का संगठन कार्मिक संगठनों में सबसे बड़ा है। जहां पर 70 प्रतिशत तक महिलाएं हैं। इसके बावजूद महिलाओं की समस्या जस की तस है। इन मुद्दों को देखते हुए महिला शिक्षक संगठन का गठन किया गया। मेरा लक्ष्य है कि पुरुष और महिला शिक्षकों को बराबरी का दर्जा मिले ...सुलोचना मौर्या, प्रदेश अध्यक्ष, महिला शिक्षक संघ।
नारी को पूजनीय बनाकर पूजा जाता है अथवा सजावट का सामान समझा जाता है। हमें अपनी पूजा नहीं करवानी है। हम सिर्फ इतना चाहते हैं कि हमारे अस्तित्व को बराबरी से स्वीकार किया जाए। हम समाज में सबके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने की क्षमता रखते हैं। एक शिक्षिका होने के नाते हर सामाजिक जिम्मेदारी को भी बखूबी निभाना चाहते हैं, नारी का वास्तविक सम्मान जरूरी है ...लल्ली सिंह, जिलाध्यक्ष, प्राथमिक शिक्षक प्रशिक्षित स्नातक एसोसिएशन।
एक शिक्षक होने पर गर्व महसूस करती हूं। महिला होने के नाते दोहरी जिम्मेदारियों के साथ प्रत्येक बच्चे की नींव मजबूत करने का लक्ष्य रखा है। खुद की तरह आगे बेटियों को बढ़ते देखना चाहती हूं। आज भी गांव के परिवेश के कारण बेटियों को लैंगिक असमानता का सामना करना पड़ता है। ऐसे में अभिभावकों को प्रेरित करने का संकल्प लिया है कि वह अपनी बेटियों को जरूर पढ़ाएं ...मीना मौर्या ( शिक्षिका)।
महिलाओं को शिक्षा के क्षेत्र में बराबर का भागीदार माना जाये, इसके लिए ग्रामीण क्षेत्र में डोर टू डोर शिक्षा का बिगुल बजाया। बेटियों को पढ़ने के लिए प्रेरित करने का लगातार प्रयास जारी है। जो बच्चियां पांचवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ देती हैं उनको घर से लाने का प्रयास किया जाता है .. विमलेश सिंह, ( शिक्षिका) मोहनलालगंज ।
सरकारी विद्यालय की शिक्षिका होने का गर्व है। मैं हमेशा ये लक्ष्य तय करती हूं कि हर दिन बच्चों को क्या नया पढ़ा सकती हूं। साथ ही पाठ्यक्रम के साथ-साथ नई तकनीक से भी अवगत कराती हूं। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी साक्षरता की कमी है, जिसको पूरा करने का लक्ष्य है। मेरा एक सपना है कि हर गांव की बेटी पढ़ी लिखी हो... प्रमिला मौर्या, ( शिक्षिका), बाराबंकी।
स्कूल के प्रत्येक बच्चे को अपना बच्चा समझकर पढ़ाती हूं। मेरे विद्यालय का एक-एक बच्चा पढ़ने लिखने में तेज हो तभी उनकी तकदीर बदल सकती है। मेरा यह मानना है कि कोई भी बच्चा पढ़ जायेगा तो उसका भविष्य अपने आप सुधर जायेगा। कई बार बेटियों की पढ़ाई के लिए उनके माता पिता को बहुत समझाना पड़ता है ... मधू, ( शिक्षिका) बाराबंकी।
शिक्षक का कर्तव्य है कि समाज को जागरूक करें। महिलाएं आज किसी से कम नहीं है लेकिन समाज ये बात आसानी से स्वीकार नहीं करना चाहता। ऐसे लोगों का भ्रम दूर हो और महिलाओं को बराबरी का दर्जा मिले यही सबसे बड़ा महिला का सम्मान है। मेरा लक्ष्य है कि गांव से जुड़ी हर बेटी शिक्षित हो ...नीलम मौर्या, ( शिक्षिका) बाराबंकी।
विद्यालय तक पहुंचे एक-एक बच्चे को शिक्षित करने का संकल्प लिया है। शिक्षा ही एक मात्र विकल्प है, जो समाज को बदल सकती है। इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है। घर से लेकर विद्यालय तक दोहरी जिम्मेदारी निभाते हुए कोशिश रहते है कि हर दिन बच्चों को क्वालिटी एजुकेशन दे सकें ...निशा सिंह, ( शिक्षिका) बख्शी का तालाब।
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