देश में दम तोड़ता विदेशों में जाने वाला आम, किसान परेशान... जानें आखिर क्या है VHT जो बना नुकसान की वजह

Amrit Vichar Network
Published By Muskan Dixit
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लखनऊ: विश्व प्रसिद्ध मलिहाबादी आम के उत्पादकों और निर्यातकों के लिए यह साल बेहद मुश्किलभरा साबित हो रहा है। रासायनिक कीटनाशकों के अधिक इस्तेमाल और अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा न उतर पाने की वजह से पहले जापान और फिर अमेरिका जैसे बड़े देशों ने भारतीय आम की खेप लेने से इनकार कर दिया। इसके साथ ही खाड़ी और यूरोपीय देशों में भी निर्यात प्रभावित होने की कगार पर है, जिससे बागबानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।

जापान ने क्यों लगाई रोक

जापान की एक टीम उत्तर प्रदेश के रहमानपुर स्थित वेपर हीट ट्रीटमेंट (VHT) सेंटर का निरीक्षण करने पहुंची थी। निरीक्षण के दौरान टीम को वहां सफाई व्यवस्था और कीट नियंत्रण प्रक्रिया में खामियां मिलीं, जिससे वे असंतुष्ट नजर आए। इसके बाद जापान ने भारत से आम के आयात पर रोक लगाने का फैसला किया।

किसानों की मेहनत पर पानी

मलिहाबाद के माल क्षेत्र के प्रमुख बागबान बिशन पाल सिंह, जो पिछले दो दशकों से अमेरिका और जापान को आम निर्यात कर रहे थे, इस बार भारी नुकसान झेल रहे हैं। उन्होंने बताया कि फसल को सुरक्षित रखने के लिए पेड़ों पर लगे छोटे आमों पर विशेष सुरक्षा थैलियां लगवाई गई थीं, जिस पर लाखों रुपये खर्च हुए।

आम विक्रेताओं के अनुसार, जो उच्च गुणवत्ता के आम जापान में ₹150 प्रति किलो तक बिकते थे, अब विदेशी बाजार बंद होने के कारण स्थानीय मंडियों में ₹28 से ₹35 प्रति किलो तक बेचे जा रहे हैं।

पद्मश्री कलीमुल्ला खान ने जताई चिंता

आम की नई किस्में विकसित करने के लिए पद्मश्री से सम्मानित कलीमुल्ला खान ने इस स्थिति पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि बाजार में नकली और अत्यधिक जहरीले कीटनाशकों का उपयोग बढ़ गया है, जो न केवल फसलों की गुणवत्ता को नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि मानव स्वास्थ्य के लिए भी खतरनाक है। उन्होंने कहा कि जापान जैसे देश खाद्य सुरक्षा को लेकर बेहद सख्त हैं, इसलिए उन्होंने कड़ा रुख अपनाया है।

प्रीमियम भारतीय आमों पर असर

इस फैसले का सबसे ज्यादा असर उन प्रीमियम भारतीय आमों पर पड़ा है, जिनकी जापान में विशेष मांग रही है। इनमें अल्फांसो, केसर, लंगड़ा और बंगनपल्ली शामिल हैं। वर्ष 2025-26 में जापान को निर्यात किए गए भारतीय आमों में गुजरात का केसर आम सबसे आगे रहा। एक रिपोर्ट के अनुसार, ताजे और प्रोसेस्ड आमों का कुल निर्यात लगभग 1.54 मिलियन डॉलर (करीब 14.73 करोड़ रुपये) रहा, जिसमें केसर आम की हिस्सेदारी करीब 0.2 मिलियन डॉलर (लगभग 2 करोड़ रुपये) थी।

हालांकि, कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA) के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने लगभग 29,938 मीट्रिक टन ताजे आमों का निर्यात किया, जिसकी कुल कीमत 56.5 मिलियन डॉलर (करीब 537 करोड़ रुपये) रही। भारत के प्रमुख निर्यात बाजारों में UAE, अमेरिका, ब्रिटेन, कुवैत और कतर शामिल रहे, जबकि जापान शीर्ष खरीदार देशों में नहीं था। इसके बावजूद जापान में भारतीय आमों की प्रीमियम पहचान बनी हुई है।

निर्यात संकट के मुख्य कारण

1. कीटनाशकों का अधिक इस्तेमाल: बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि के बाद फसलों को कीड़ों से बचाने के लिए अधिक मात्रा में कीटनाशकों का उपयोग किया गया, जिससे फलों में रासायनिक अवशेष अंतरराष्ट्रीय मानकों से अधिक पाए गए।

2. VHT प्रक्रिया में खामियां: जापान के प्रतिनिधिमंडल द्वारा मलिहाबाद और महाराष्ट्र के पैक हाउस का निरीक्षण करने पर वेपर हीट ट्रीटमेंट प्रक्रिया में कमी पाई गई।

3. वैश्विक परिस्थितियां: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण हवाई और समुद्री माल ढुलाई महंगी हो गई, जिससे निर्यात प्रभावित हुआ।

क्या है वेपर हीट ट्रीटमेंट (VHT)

विदेशों में आम निर्यात से पहले फलों को वेपर हीट ट्रीटमेंट प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसमें आमों को एक विशेष गर्म हवा वाले चैंबर में निर्धारित समय तक रखा जाता है, जिससे फलों में मौजूद ‘फ्रूट फ्लाई’ और उनके लार्वा नष्ट हो जाते हैं और कीटनाशकों का प्रभाव भी कम होता है।

पहले भी लग चुका है प्रतिबंध

यह पहली बार नहीं है जब जापान ने भारतीय आमों पर रोक लगाई है। इससे पहले 1980 के दशक में ‘फ्रूट फ्लाई’ के कारण प्रतिबंध लगाया गया था, जिसे तकनीकी सुधारों के बाद 2006 में हटाया गया था।

वैश्विक उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी

भारत दुनिया के कुल आम उत्पादन का लगभग 40 से 45 प्रतिशत उत्पादन करता है। उत्तर प्रदेश में करीब 2.8 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में आम की खेती होती है, जिससे हर साल लगभग 70 लाख मीट्रिक टन उत्पादन होता है। मलिहाबाद, माल और काकोरी इसके प्रमुख केंद्र हैं। वर्ष 2024-25 में भारत ने करीब 30 हजार टन आम UAE, ब्रिटेन, कुवैत और कतर जैसे देशों को निर्यात किए थे, जिनमें जापान की हिस्सेदारी लगभग 2 हजार मीट्रिक टन तक थी।

अब किसानों को आशंका है कि यदि स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो अन्य देश भी इसी तरह के कड़े कदम उठा सकते हैं।

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