नैनीताल: वनों को दोबारा परिभाषित करने की क्यों पड़ी जरूरत?

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
On

हाईकोर्ट ने वन नियम में संशोधन पर सरकार से जवाब के साथ मांगा रिकॉर्ड

नैनीताल, अमृत विचार। हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी व न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की खंडपीठ ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है कि जब वनों को सुप्रीम कोर्ट ने परिभाषित किया है तो राज्य सरकार को इसे दोबारा से परिभाषित करने की जरूरत क्यों पड़ी? प्रदेश को वन विरासत में मिले हैं। 

राज्य सरकार द्वारा वन अधिनियम में संशोधन कर 5 हेक्टेयर से कम क्षेत्र में फैले या 60 प्रतिशत से कम घनत्व वाले वनो को वन नहीं मानने के खिलाफ दायर जनहित याचिकाओ पर बुधवार को खंडपीठ ने सुनवाई करते हुए सरकार को 12 मई को इससे संबंधित सम्पूर्ण रिकार्ड कोर्ट में पेश करने के निर्देश दिए हैं। अगली सुनवाई 12 मई को होगी।

मामले के अनुसार नैनीताल निवासी पर्यावरणविद प्रोफेसर अजय रावत व अन्य ने जनहित याचिकाएं दायर कर कहा कि 21 नवंबर 2019 को उत्तराखंड के वन एवं पर्यावरण अनुभाग ने आदेश जारी कर कहा कि उत्तराखंड में जहां 10 हेक्टेयर से कम या 60 प्रतिशत से कम घनत्व वाले वन क्षेत्र हैं,  उनको वनों की श्रेणी से बाहर रखा गया है या उनको वन नहीं माना।

याचिकर्ताओं का कहना है कि यह आदेश एक ऑफिशियल आदेश है, इसे लागू नहीं किया जा सकता है क्योंकि न ही यह शासनादेश है और न ही यह कैबिनेट से पारित आदेश है। सरकार ने इसे अपने लोगो को फायदा पहुंचाने के लिए घुमा फिरा कर यह आदेश जारी किया है। 

याचिकर्ताओ का यह भी कहना है कि फॉरेस्ट कन्जर्वेशन एक्ट 1980 के अनुसार प्रदेश में 71 प्रतिशत वन क्षेत्र घोषित है जिसमें वनों की श्रेणी को भी विभाजित किया हुआ है परन्तु इसके अलावा कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं जिनको किसी भी श्रेणी में नहीं रखा गया। याचिकर्ताओं यह भी कहना है कि इन क्षेत्रों को भी वन क्षेत्र की श्रेणी में शामिल किया जाए, जिससे इनके दोहन या कटान पर रोक लग सके।

सुप्रीम कोर्ट ने 1996 के अपने आदेश गोडा वर्मन बनाम केंद्र सरकार में कहा है कि कोई भी वन क्षेत्र चाहे उसका मालिक कोई भी हो, उनको वनो की क्षेत्र के श्रेणी में रखा जाएगा और वनों का अर्थ क्षेत्रफल या घनत्व से नही है। विश्वभर में भी जहां 0.5 प्रतिशत क्षेत्र में पेड़ पौधे हैं या उनका घनत्व 10 प्रतिशत है तो उनको भी वनों की श्रेणी में रखा गया। सरकार के इस आदेश पर वन एवं पर्यावरण मंत्रालय भारत सरकार ने कहा था कि प्रदेश सरकार वनों की परिभाषा न बदलें। उत्तराखंड में 71 प्रतिशत वन होने के कारण कई नदियों व सभ्यताओं का अस्तित्व बना हुआ है।

 

संबंधित समाचार