वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण, हजार स्तंभ मंदिर
तेलंगाना के वरंगल के पास हनमकोंडा शहर में स्थित श्री रुद्रेश्वर स्वामी मंदिर (हजार स्तंभ मंदिर) स्थापित है। हनमकोंडा पहाड़ी के आधार पर काकतीय शासन के दौरान बना यह मंदिर वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसे वेई स्तंबाला गुड़ी (हजार स्तंभ मंदिर) के रूप में जाना जाता है। संभवतः काकतीय राजा रुद्र देव (1162-63 सीई) द्वारा बनाई गई सबसे प्रारंभिक संरचना है। न केवल भक्तों के बल्कि हर इतिहास उत्साही और वास्तुकला प्रेमियों के लिए शानदार जगह है। यह मंदिर दर्शाता है कि काकतीय लोग एक उत्कृष्ट वास्तुकार थे।
हजार स्तंभ मंदिर तीन देवताओं को समर्पित है। यहां प्रत्येक पीठासीन देवता के लिए तीन अलग-अलग मंदिर हैं,। हजार स्तंभ मंदिर के चौथी तरफ एक मंच पर भगवान शिव के पवित्र बैल नंदी की एक सुंदर नक्काशीदार मूर्ति है। एक ही पत्थर से उकेरी गई नंदी की मूर्ति बीते युगों की कलात्मक सुंदरता की झलक प्रस्तुत करती है। मूर्ति का मुख पूर्व दिशा की ओर है, जो नंदी की अन्य मूर्तियों से अलग है, जिनका मुख आमतौर पर पश्चिम की ओर होता है। इस मंदिर की यात्रा कर मैं खुद को धन्य मानता हूं और चाहूंगा कि यहां हर कोई एक बार जरूर आए।-अध्यात्म त्रिवेदी, एडवोकेट
बेसर शैली में स्थापित है मंदिर
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मंदिर अर्ध-सपाट छत के साथ एक तारे के आकार के जगती (चबूतरे) पर स्थित है। स्तंभों का एक शानदार हॉल, जिसे कल्याण मंडप के नाम से जाना जाता है। मंदिर के दक्षिण में संरेखण में स्थित है। स्तंभ शिलालेख के अनुसार रुद्र देव-प्रथम (1158-1195 सीई) के समय में पूरा होने का संकेत मिलता है। कहा जाता है कि इसके निर्माण में लगभग 72 साल लगे थे। यह मंदिर भगवान शिव, विष्णु और सूर्य को समर्पित है। श्री रुद्रेश्वर स्वामी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध इस मंदिर का निर्माण चालुक्य मंदिरों की स्थापत्य शैली अर्थात बेसर शैली में किया गया है।
राजा रुद्रदेव के नाम पर रुद्रेश्वर स्वामी मंदिर
कहा जाता है कि इसका नाम राजा रुद्रदेव के नाम पर रखा गया है और इसलिए इसे श्री रुद्रेश्वर स्वामी मंदिर के नाम से जाना जाता है। मंदिर में प्रवेश करते ही प्रवेश द्वार के दोनों ओर हाथियों की सुंदर नक्काशीदार मूर्तियां आपका स्वागत करती हैं। मंदिर की छत और बाहरी दीवारों पर की गई नक्काशी भी उतनी ही आकर्षक है। समय के साथ, 132 स्तंभों वाले कल्याण मंडप की संरचनात्मक स्थिरता विभिन्न कारकों के कारण कमजोर हो गई। तुगलक वंश के आक्रमण के दौरान 1000 स्तंभ मंदिर को काफी नुकसान पहुंचा। इस मंदिर को मुगल साम्राज्य ने अपने आक्रमण के दौरान नष्ट कर दिया था। बाद में इसे भारतीय पुरातत्व सर्वे द्वारा 2004 में पुनर्निर्मित किया गया।
1000 नक्काशीदार खंभे
जैसा कि नाम से ही पता चलता है, इस मंदिर में 1000 बेहतरीन नक्काशीदार खंभे हैं, जो मंदिर की पूरी दीवार में दृढ़ता के साथ लगाए गए हैं। इसकी चट्टान से बनी हाथी की मूर्ति, नंदी (भगवान शिव का दिव्य वाहन) की विशाल मूर्ति, जटिल नक्काशी आपको मंत्रमुग्ध कर देगी। हजार स्तंभ मंदिर की आध्यात्मिक आभा इस अनुभव को और भी समृद्ध बनाती है। इसका एक दिलचस्प पहलू यह है कि यहां तीसरे देवता भगवान ब्रह्मा नहीं हैं, जिन्हें त्रिदेवों (भगवान शिव, विष्णु और ब्रह्मा) में से एक माना जाता है। यहां भगवान सूर्य को तीसरे देवता के रूप में पूजा जाता है। त्रिकुटालयम कहे जाने वाले इस मंदिर के तीन मुख्य देवता भगवान शिव, विष्णु और सूर्य हैं। हजार स्तंभ मंदिर की पूरी संरचना बेसर शैली के मुख्य लक्षण तारे के आकार में है। जटिल नक्काशीदार खंभे मंदिर की संरचना का भाग हैं, जबकि मनोरम मूर्तियां दीवारों में उत्कृष्टता से जोड़ी गई हैं। यहां बगीचे में विभिन्न छोटे-छोटे शिव लिंग भी देखे जा सकते हैं।
मंदिर जाने के लिए रास्ता
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मंदिर जाने के लिए आप हैदराबाद हवाई अड्डे से वरंगल तक ट्रेन या कार से यात्रा कर सकते हैं। यात्रा का समय परिवहन के साधन के आधार पर लगभग 2.5 से 5 घंटे तक हो सकता है। यह स्थल वरंगल और हनमकोंडा शहर के बीच वरंगल रेलवे स्टेशन से लगभग छह किमी दूर है। स्टेशन से, पर्यटक ऑटो रिक्शा, टैक्सी अथवा नियमित रूप से चलने वाली सिटी बसों से यात्रा कर सकते हैं। निकटतम प्रमुख हवाई अड्डा हैदराबाद का राजीव गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है, जो लगभग 160 किमी दूर है।
