35 साल पुराने रामकुंवर हत्याकांड में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, उम्रकैद बरकरार; दोषियों को 15 दिन में सरेंडर का आदेश
मुरादाबाद। करीब 35 वर्ष पुराने चर्चित रामकुंवर हत्याकांड में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए दोषियों की उम्रकैद की सजा बरकरार रखी है। अदालत ने दोषियों की अपील खारिज करते हुए उन्हें 15 दिनों के भीतर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है। आदेश का पालन नहीं करने पर उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किए जाएंगे।
न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष की ओर से पेश किए गए प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, चिकित्सीय साक्ष्य और अन्य सबूत दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं। अदालत ने बलिस्टर, महेश और नरेश की अपील को निरस्त करते हुए निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा।
1987 में हुई थी सनसनीखेज हत्या
मामला 27 सितंबर 1987 का है। थाना कुंदरकी क्षेत्र के बसेड़ा गांव में मंदिर से अखंड रामायण पाठ सुनकर लौट रहे रामकुंवर की पुरानी रंजिश के चलते गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। आरोप है कि हत्या के बाद आरोपियों ने शव को रस्सी से बांधकर जंगल तक घसीटा और पहचान छिपाने के उद्देश्य से धड़ से सिर अलग कर दिया। घटना के दौरान हुई फायरिंग में वीरम नाम की युवती भी छर्रे लगने से घायल हो गई थी। पुलिस ने 4 अक्टूबर 1987 को गन्ने के खेत से रामकुंवर का धड़ बरामद किया था, लेकिन सिर कभी बरामद नहीं हो सका।
पुरानी रंजिश बनी हत्या की वजह
जांच में सामने आया कि घटना से करीब ढाई साल पहले महेश ने अपनी बहन सुमन को भगाने का आरोप लगाते हुए रामकुंवर के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था। अभियोजन के अनुसार इसी पुरानी रंजिश के चलते हत्या की साजिश रची गई और वारदात को अंजाम दिया गया।
निचली अदालत ने 1989 में सुनाई थी उम्रकैद
अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने 2 मई 1989 को महेश, नरेश और विरपाल को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत तथा बलिस्टर को धारा 302/34 के तहत आजीवन कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके अलावा उन्हें धारा 201 और धारा 324/34 के तहत भी दोषी ठहराया गया था।
हाईकोर्ट ने खारिज किए सभी तर्क
दोषियों ने हाईकोर्ट में दलील दी थी कि प्राथमिकी दर्ज करने में देरी हुई, गवाह मृतक के परिजन थे और उनके बयानों में विरोधाभास है। हालांकि अदालत ने इन सभी तर्कों को खारिज कर दिया। खंडपीठ ने कहा कि घटना के लगभग साढ़े चार घंटे के भीतर प्राथमिकी दर्ज कर ली गई थी, इसलिए इसमें किसी प्रकार की मनगढ़ंत कहानी या अनावश्यक देरी का सवाल नहीं उठता। अदालत ने यह भी माना कि प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के बयान पोस्टमार्टम रिपोर्ट और चिकित्सीय साक्ष्यों से पूरी तरह मेल खाते हैं। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर किसी गवाह की गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता कि वह मृतक का रिश्तेदार है।
पीड़ित पक्ष ने फैसले का किया स्वागत
हाईकोर्ट के फैसले के बाद पीड़ित पक्ष ने संतोष जताते हुए कहा कि भले ही न्याय मिलने में लंबा समय लगा, लेकिन इस निर्णय ने न्यायपालिका में उनका विश्वास और मजबूत किया है।
