'मिट्टी स्वस्थ तो इंसान स्वस्थ': प्रो. हिमांशु पाठक बोले- Soil Health बिगड़ी तो Nutrition और Health दोनों होंगे प्रभावित
एनबीआरआई के प्रो. के.एन. कौल स्मृति व्याख्यान में कृषि वैज्ञानिक प्रो. हिमांशु पाठक ने कहा- 1950 के खाद्यान्न संकट से निकलकर भारत 2010 में खाद्यान्न निर्यातक बना, 75 वर्षों में कृषि उत्पादन में ऐतिहासिक बढ़ोतरी दर्ज हुई।
लखनऊ, अमृत विचारः मिट्टी की गुणवत्ता केवल खेती और उत्पादन का विषय नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध मानव स्वास्थ्य से भी जुड़ा हुआ है। यदि मिट्टी की उर्वरता और गुणवत्ता प्रभावित होती है तो उससे पैदा होने वाले अन्न, फल और सब्जियों की पोषण गुणवत्ता भी प्रभावित होगी, जिसका असर लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ेगा। यह बात अंतरराष्ट्रीय अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान (ICRISAT) के महानिदेशक एवं वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक प्रो. हिमांशु पाठक ने कही।
वे सीएसआईआर–राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (एनबीआरआई) में आयोजित प्रो. के.एन. कौल स्मृति व्याख्यान को संबोधित कर रहे थे। उनका व्याख्यान "फूड टू न्यूट्रिशन, इनकम एंड एनवायरनमेंट सिक्योरिटी: नेक्स्ट-जेनरेशन एग्रीकल्चर" विषय पर आधारित था।
1950 के खाद्यान्न संकट से निकलकर भारत बना निर्यातक देश
प्रो. हिमांशु पाठक ने कहा कि पिछले 75 वर्षों में भारतीय कृषि ने उल्लेखनीय प्रगति की है। 1950 के दशक में देश खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था, लेकिन वर्ष 2000 तक भारत खाद्य आत्मनिर्भरता हासिल करने में सफल रहा और 2010 तक खाद्यान्न अधिशेष एवं निर्यातक राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान बनाई।
उन्होंने बताया कि सात दशकों के दौरान कृषि योग्य भूमि में सीमित वृद्धि के बावजूद खाद्यान्न उत्पादन लगभग सात गुना बढ़ा है। साथ ही दुग्ध, मत्स्य, फल और सब्जी उत्पादन में भी उल्लेखनीय विस्तार हुआ है, जिससे भारत कई कृषि उत्पादों में आयातक से निर्यातक देश बन चुका है।
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75 वर्षों में कई कृषि उत्पादों का उत्पादन कई गुना बढ़ा
प्रो. पाठक के अनुसार वर्ष 1950 की तुलना में 2024-25 तक अन्न, दाल, तिलहन, कपास, गन्ना, बागवानी, दूध, मछली, अंडे और मांस उत्पादन में 3 से 154 गुना तक वृद्धि दर्ज की गई है।
उन्होंने बताया कि हॉर्टिकल्चर उत्पादन 1950-51 में जहां 25 मिलियन टन था, वहीं 2022-23 में बढ़कर 367 मिलियन टन से अधिक हो गया है।
एनबीआरआई में आयोजित हुआ स्मृति व्याख्यान
कार्यक्रम में सीएसआईआर–एनबीआरआई के निदेशक डॉ. ए.के. शासनी ने प्रतिभागियों का स्वागत किया। कार्यक्रम का समापन वैज्ञानिक डॉ. पूनम सी. सिंह के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।
भारत की कृषि यात्रा: प्रमुख पड़ाव
- 1950: खाद्यान्न की अत्यंत कमी
- 1970: खाद्यान्न का अभाव
- 2000: खाद्यान्न में आत्मनिर्भरता
- 2010: खाद्यान्न सुरक्षा एवं अधिशेष उत्पादन के साथ निर्यातक देश
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