दान विलेख की शर्तें पूरी तो दान कर्ता अपने उत्तराधिकार का दावा नहीं कर सकते: हाईकोर्ट

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प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गिफ्ट डीड से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि अगर दान प्राप्तकर्ता ने दान विलेख की सभी शर्तों का पालन किया है तो लगभग 53 साल पहले दान में दी गई ज़मीन को दानकर्ता के उत्तराधिकारी वापस नहीं ले सकते। बदलते समय और सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप दान विलेख की शर्तों की व्याख्या लचीले और व्यावहारिक तरीके से की जानी चाहिए।

उक्त आदेश न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकलपीठ ने श्रीमती अर्चना त्यागी और चार अन्य द्वारा दाखिल प्रथम अपील को खारिज करते हुए पारित किया। मामले के अनुसार वर्ष 1968 में जब दानकर्ता ने अपने पड़ोसी को सिनेमा हॉल बनाने के लिए ज़मीन दान में दी थी तो दान विलेख में शर्त रखी गई थी कि यह ज़मीन केवल सिनेमा हॉल बनाने के लिए ही उपयोग होगी। यदि अनुमति न मिले या सिनेमा हॉल न बने, तो ज़मीन वापस ली जा सकेगी।

कोर्ट ने दान विलेख पर विचार करते हुए पाया कि दान प्राप्तकर्ता ने शर्तों का पालन करते हुए उसी ज़मीन पर सिनेमा हॉल बनवाया और लगभग 47 वर्षों तक उसका संचालन किया, लेकिन समय बदलने पर सिंगल स्क्रीन सिनेमा हॉल की जगह आधुनिक मल्टीप्लेक्स का चलन शुरू हुआ। ऐसे में दान प्राप्त कर्ता ने पुराना हॉल गिराकर उसी स्थान पर मल्टीप्लेक्स बनाने का फैसला लिया। इस पर दानकर्ता के उत्तराधिकारियों ने आपत्ति जताई और ज़मीन की वापसी की मांग करते हुए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि दान प्राप्तकर्ता ने दान विलेख की सभी शर्तों का पालन किया है, इसलिए दानकर्ता अब स्वामित्व या ज़मीन वापसी का दावा नहीं कर सकते। मल्टीप्लेक्स भी सिनेमा हॉल का ही आधुनिक स्वरूप है, जिसका मुख्य उद्देश्य फिल्म प्रदर्शन और मनोरंजन ही है। यदि दान विलेख की शर्तों को इस रूप में समझा जाए कि पुराना भवन हमेशा जस का तस खड़ा रहना चाहिए, तो यह शर्त “असम्भव और अव्यावहारिक” होगी।

इसके अलावा नंदन सिनेमा हॉल के पुनर्निर्माण एवं रीमॉडलिंग के लिए प्रस्तुत भवन योजना को मेरठ विकास प्राधिकरण ने स्वीकृति भी प्रदान कर दी है। यह स्वीकृति उत्तर प्रदेश सरकार के उस आदेश के अनुरूप दी गई, जिसमें सिनेमा व्यवसाय को बढ़ावा देने की नीति अपनाई गई थी। इसके साथ ही विपक्षी ने कोर्ट को बताया कि पहले भी वह उक्त भूमि पर सिनेमा हॉल का निर्माण कर उसका संचालन करता रहा है और आगे भी इसी उद्देश्य से भूमि का उपयोग करेगा।

राजस्व अभिलेखों में भी उसका नाम दर्ज है, जिससे यह सिद्ध होता है कि वह उपहारस्वरूप प्राप्त भूमि का विधिक स्वामी है। अतः ट्रांसफर आफ प्रॉपर्टी एक्ट के तहत उसे इस भूमि से वंचित नहीं किया जा सकता है। अंत में कोर्ट ने अपील को खारिज करते हुए कहा कि दानकर्ता के उत्तराधिकारियों का अब ज़मीन पर कोई अधिकार नहीं है और दान प्राप्तकर्ता को मल्टीप्लेक्स बनाने से रोका नहीं जा सकता।

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