दहाड़ के सामने बीमारी की चुनौती 

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Published By Anjali Singh
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मध्य भारत के जंगलों से हाल के दिनों में सामने आई घटनाओं ने वन्यजीव संरक्षण जगत की चिंता बढ़ा दी है। मध्य प्रदेश के कान्हा परिक्षेत्र तथा उससे जुड़े वन क्षेत्रों में अल्प अवधि के भीतर कई बाघों और शावकों की असामान्य मौतों ने अनेक प्रश्न खड़े किए हैं। अंतिम वैज्ञानिक पुष्टि जांच पूरी होने के बाद ही संभव होगी, लेकिन प्रारंभिक स्तर पर कैनाइन डिस्टेंपर विषाणु (सीडीवी) की संभावित भूमिका पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। यदि यह आशंका सही साबित होती है, तो यह केवल वन्यजीव संरक्षण नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पर्यावरणीय सुरक्षा का भी गंभीर विषय होगा। इसी बीच उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में एक बाघिन की मृत्यु ने भी वन्यजीव स्वास्थ्य को लेकर नई चर्चाओं को जन्म दिया है।

बाघ क्यों हैं जंगलों की जीवनरेखा

भारत में बाघ केवल एक वन्यजीव नहीं, बल्कि पूरे वन पारितंत्र की जीवन शक्ति का प्रतीक है। खाद्य श्रृंखला के शीर्ष पर स्थित होने के कारण वह शाकाहारी जीवों की संख्या को नियंत्रित रखता है। यदि बाघों की संख्या घटती है तो वनस्पतियों पर दबाव बढ़ता है, जिससे वन पुनर्जनन, जल स्रोत, मिट्टी संरक्षण और जैव विविधता प्रभावित होती है। इसलिए बाघों की सुरक्षा वास्तव में पूरे जंगल और उसके पारिस्थितिक संतुलन की सुरक्षा है।

सफलता के साथ उभरी नई चुनौती

भारत ने पिछले कुछ दशकों में बाघ संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। अवैध शिकार, वन विनाश और मानव हस्तक्षेप से जूझती बाघ आबादी को संरक्षण कार्यक्रमों, संरक्षित क्षेत्रों के विस्तार और वैज्ञानिक निगरानी के माध्यम से पुनर्जीवित किया गया। आज विश्व के अधिकांश जंगली बाघ भारत में पाए जाते हैं। लेकिन यह सफलता अब नई चुनौतियों के साथ सामने खड़ी है, जिनमें संक्रामक रोग प्रमुख हैं।

वन हेल्थ की बढ़ती आवश्यकता

आज विश्वभर में “वन हेल्थ” अर्थात “एक स्वास्थ्य” की अवधारणा को विशेष महत्व दिया जा रहा है। इसका मूल सिद्धांत है कि मानव, पशु और पर्यावरण का स्वास्थ्य परस्पर जुड़ा हुआ है। वनों का खंडन, सड़कें, रेलमार्ग, बढ़ता शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन भी संक्रमण के खतरे को बढ़ा रहे हैं। ऐसे में वन्यजीव स्वास्थ्य को संरक्षण नीति का केंद्रीय विषय बनाना समय की आवश्यकता है।

भविष्य की रणनीति और सामुदायिक भागीदारी

देश के सभी प्रमुख बाघ आवासों में सुदृढ़ वन्यजीव स्वास्थ्य निगरानी प्रणाली विकसित करना आवश्यक है। मृत वन्यजीवों का वैज्ञानिक परीक्षण, आधुनिक प्रयोगशालाओं में नमूनों का विश्लेषण, रोग संबंधी आंकड़ों का राष्ट्रीय स्तर पर संकलन तथा वन अधिकारियों, वैज्ञानिकों और पशु चिकित्सकों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित किया जाना चाहिए। साथ ही संरक्षित क्षेत्रों के आसपास रहने वाले कुत्तों के नियमित टीकाकरण और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी भी बेहद जरूरी है।

संरक्षण का नया अध्याय

भारत ने बाघ संरक्षण में जो उपलब्धि हासिल की है, उसे बनाए रखने के लिए अब वन्यजीव स्वास्थ्य सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। कान्हा और तराई की घटनाएं संकेत देती हैं कि भविष्य का संरक्षण केवल जंगल बचाने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि रोग निगरानी, जैव सुरक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान और सामुदायिक सहभागिता उसकी आधारशिला होंगे। यदि आने वाली पीढ़ियां भी जंगलों में बाघों की दहाड़ सुन सकें, तो संरक्षण की इस नई चुनौती का समय रहते प्रभावी समाधान करना होगा।

क्या है कैनाइन डिस्टेंपर विषाणु

कैनाइन डिस्टेंपर विषाणु मूलतः कुत्तों और अन्य मांसाहारी जीवों में पाया जाने वाला संक्रामक रोग है। यह श्वसन, पाचन और तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है। संक्रमित जीव में बुखार, कमजोरी, भूख कम लगना, आंख और नाक से स्राव तथा बाद की अवस्था में असामान्य व्यवहार, संतुलन खोना और मृत्यु तक की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। वैज्ञानिक अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि बाघ, सिंह, तेंदुआ, भेड़िया, सियार और लोमड़ी जैसे अनेक वन्य मांसाहारी जीव भी इससे प्रभावित हो सकते हैं।

जंगलों तक कैसे पहुंचता है संक्रमण

इस संक्रमण का सबसे बड़ा कारण मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ता संपर्क माना जाता है। अधिकांश राष्ट्रीय उद्यानों और बाघ अभयारण्यों के आसपास बसे गांवों में बड़ी संख्या में पालतू और आवारा कुत्ते रहते हैं। यदि उनमें संक्रमण मौजूद हो तो वे वन्यजीवों तक रोग पहुंचाने का माध्यम बन सकते हैं। यही कारण है कि अब संरक्षण विज्ञान केवल जंगलों की सुरक्षा तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि वन्यजीव स्वास्थ्य भी इसका अभिन्न हिस्सा बन चुका है।

 

– डॉ. जितेंद्र शुक्ला, वन्यजीव विशेषज्ञ