धामी सरकार का बड़ा फैसला : उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड खत्म, अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण लागू, जानें अब क्या होगा?

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
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उत्तराखंड सरकार ने मदरसा बोर्ड को समाप्त कर राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण की शुरुआत की। अब मुस्लिम समेत सभी छह अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों के शिक्षण संस्थानों को एक समान व्यवस्था के तहत मान्यता मिलेगी।

देहरादून। उत्तराखंड सरकार ने शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव करते हुए बुधवार से राज्य के मदरसा बोर्ड को समाप्त कर उसकी जगह राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण लागू कर दिया है। अब मुस्लिम समुदाय के साथ-साथ सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई और पारसी समुदाय के शिक्षण संस्थान भी इसी प्राधिकरण के दायरे में आएंगे।

देहरादून में आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने नए प्राधिकरण का शुभारंभ किया और विभिन्न अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को मान्यता प्रमाणपत्र भी वितरित किए। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड ज्ञान और संस्कृति की भूमि रहा है तथा राज्य की जिम्मेदारी है कि वह शिक्षा और संस्कार के क्षेत्र में देश के लिए आदर्श स्थापित करे।

मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार का उद्देश्य सभी वर्गों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण, आधुनिक और संस्कारयुक्त शिक्षा उपलब्ध कराना है। इसी सोच के तहत एक जुलाई 2026 से राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण लागू किया गया है और मदरसा बोर्ड को भंग कर दिया गया है।

धामी ने कहा कि यह कदम केवल उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि देश की शिक्षा व्यवस्था के लिए भी एक महत्वपूर्ण पहल साबित होगा। उन्होंने कहा कि जैसे समान नागरिक संहिता के जरिए 'वन नेशन, वन लॉ' की दिशा में उत्तराखंड ने पहल की है, उसी तरह अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के माध्यम से 'वन नेशन, वन एजुकेशन' की अवधारणा को भी आगे बढ़ाया जा रहा है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि नए प्राधिकरण का उद्देश्य किसी भी समुदाय की धार्मिक पहचान, परंपरा या अधिकारों को प्रभावित करना नहीं है, बल्कि सभी अल्पसंख्यक समुदायों के बच्चों को बेहतर शैक्षणिक अवसर उपलब्ध कराना है। सरकार चाहती है कि विद्यार्थी अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े रहने के साथ-साथ विज्ञान, गणित, कंप्यूटर, भाषाओं और आधुनिक तकनीकों में भी दक्ष बनें।

केवल मान्यता देने तक सीमित नहीं रहेगा प्राधिकरण : धामी

मुख्यमंत्री ने कहा कि नया प्राधिकरण केवल मान्यता देने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि शिक्षक प्रशिक्षण, पारदर्शी व्यवस्था, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के प्रभावी क्रियान्वयन का भी प्रमुख माध्यम बनेगा। इससे आने वाले समय में हजारों छात्रों को लाभ मिलने की उम्मीद है।

गौरतलब है कि उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा विधेयक-2025 पिछले वर्ष अगस्त में विधानसभा के मानसून सत्र में पारित हुआ था, जबकि अक्टूबर 2025 में राज्यपाल की मंजूरी मिलने के बाद इसे कानून का रूप मिला। नए कानून के तहत पहली बार मुस्लिम समुदाय के अलावा सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई और पारसी समुदाय के शिक्षण संस्थानों को भी अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा देने का प्रावधान किया गया है।

जानिए क्या बोले अल्पसंख्यक विभाग के सचिव

अल्पसंख्यक विभाग के सचिव पराग मधुकर धकाते ने बताया कि अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थान का दर्जा प्राप्त करने के इच्छुक संस्थानों को पहले शिक्षा विभाग से संबद्धता लेनी होगी। इसके बाद वे ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से आवेदन कर राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण से मान्यता प्राप्त कर सकेंगे। उन्होंने दावा किया कि उत्तराखंड देश का पहला राज्य बन गया है, जहां सभी अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों के शिक्षण संस्थानों की मान्यता के लिए एक समान और एकीकृत व्यवस्था लागू की गई है।

मुख्य बिंदु
  • मदरसा बोर्ड की जगह राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण लागू।
  • मुस्लिम समेत छह अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों के संस्थान होंगे शामिल।
  • मुख्यमंत्री धामी ने कहा- गुणवत्तापूर्ण और आधुनिक शिक्षा उपलब्ध कराना सरकार का लक्ष्य।
  • ऑनलाइन आवेदन के जरिए मिलेगी अल्पसंख्यक संस्थान की मान्यता।
  • उत्तराखंड में पहली बार सभी अल्पसंख्यक समुदायों के लिए एक समान मान्यता व्यवस्था लागू।
अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण बनने से क्या बदलेगा?
  • एक समान व्यवस्था: अब केवल मदरसों ही नहीं, बल्कि मुस्लिम, सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई और पारसी समुदाय के सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के लिए एक ही प्राधिकरण काम करेगा।
  • मान्यता की एक प्रक्रिया: सभी संस्थानों को एक समान नियमों और ऑनलाइन प्रक्रिया के तहत मान्यता मिलेगी।
  • शिक्षा की गुणवत्ता पर जोर: शिक्षक प्रशिक्षण, पारदर्शिता और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के बेहतर क्रियान्वयन पर फोकस रहेगा।
  • आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा: धार्मिक शिक्षा के साथ विज्ञान, गणित, कंप्यूटर और तकनीकी शिक्षा को भी प्रोत्साहन मिलेगा।
  • निगरानी और जवाबदेही बढ़ेगी: सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों की मान्यता और संचालन की निगरानी एक ही प्राधिकरण के माध्यम से होगी।

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