विपुल कुमार : माध्यम से संवाद करता एक कलाकार 

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Edited By Anjali Singh
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किसी कलाकार की पहचान केवल उसके बनाए हुए शिल्पों से नहीं होती। उसकी पहचान इस बात से भी होती है कि वह अपने माध्यम को किस तरह समझता है, उसके भीतर छिपी संभावनाओं को किस तरह खोजता है और अपनी निरंतर साधना से उस माध्यम को अपनी भाषा में कैसे बदल देता है। विपुल कुमार इसी अर्थ में एक महत्वपूर्ण शिल्पकार हैं। विपुल कुमार ने अपने सृजनात्मक जीवन में अनेक माध्यमों के साथ काम किया है। काले और सफेद संगमरमर में बनाए गए उनके शिल्पों में कठोर पत्थर के भीतर छिपी संवेदनशीलता को महसूस किया जा सकता है। आकारों की दृढ़ता के साथ उनमें एक शांत और आत्मीय भाव दिखाई देता है। लेकिन समय के साथ उन्होंने अपने लिए जिस माध्यम को अधिक गहराई से चुना, वह है- सेरामिक।

सेरामिक उनके लिए केवल मिट्टी को आकार देने का माध्यम नहीं है। यह उनके लिए प्रकृति, संरचना, रिक्तता, प्रकाश और स्पर्श के साथ संवाद करने का माध्यम बन गया है। उनके शिल्पों में ठोस और खाली स्थान, ज्यामितीय संरचनाएँ, टूटन, जोड़ और सतह सब मिलकर एक ऐसी दृश्य भाषा निर्मित करते हैं जिसमें आधुनिकता और संवेदना साथ-साथ दिखाई देती हैं।

उनके सेरामिक शिल्पों को देखते हुए लगता है कि वे मिट्टी को केवल गढ़ते नहीं, बल्कि उसके स्वभाव को समझकर उसके साथ काम करते हैं। आग से गुजरने के बाद मिट्टी का बदल जाना, सतह पर उभरती दरारें, रंगों का अप्रत्याशित व्यवहार और संरचना का अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व इन सबको वे अपने सृजन का हिस्सा बनाते हैं। यही कारण है कि उनके शिल्पों में एक साथ स्थापत्य, प्रकृति और मानवीय संवेदना के संकेत दिखाई देते हैं।

उनके बड़े आकार के सार्वजनिक शिल्प इस बात का प्रमाण हैं कि उनका चिंतन केवल स्टूडियो की चारदीवारी तक सीमित नहीं है। खुले परिवेश में स्थापित उनकी संरचनाएँ अपने आसपास के वास्तु और प्रकृति से संवाद करती हैं। वे स्थान को केवल भरती नहीं हैं, बल्कि उस स्थान की दृश्य पहचान का हिस्सा बन जाती हैं।

भैंसलाना की कार्यशाला: केवल निर्माण स्थल नहीं

वर्तमान में भैंसलाना, कोटपुतली, राजस्थान स्थित उनकी निर्माणस्थली भी उनके कला-दर्शन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह स्थान केवल विपुल कुमार की व्यक्तिगत कार्यशाला नहीं है। यह उन विद्यार्थियों और युवा कलाकारों के लिए भी एक सीखने की जगह है जो सेरामिक की बारीकियों को समझने के लिए वहाँ पहुँचते हैं। कला महाविद्यालयों के नवोदित विद्यार्थी वहाँ आकर मिट्टी, आकार, भट्ठी, तापमान, ग्लेज और निर्माण की प्रक्रिया को करीब से देखते और समझते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विपुल कुमार इस ज्ञान को किसी व्यावसायिक प्रशिक्षण तक सीमित नहीं रखते। निःशुल्क रूप से अपने अनुभव और तकनीकी ज्ञान को युवा कलाकारों के साथ साझा करना उनकी कला-साधना का एक अत्यंत प्रशंसनीय पक्ष है। एक कलाकार की वास्तविक विरासत केवल उसकी कलाकृतियाँ नहीं होतीं। वह ज्ञान भी उसकी विरासत होता है जो वह अगली पीढ़ी को देता है। इस दृष्टि से विपुल कुमार की कार्यशाला एक तरह की अनौपचारिक कला-शाला भी है।

सृजन की सफलता और नकल का संकट

कला की दुनिया में एक विडंबना अक्सर देखने को मिलती है। जब किसी कलाकार की अपनी दृश्य भाषा विकसित होती है, जब उसके काम को पहचान मिलने लगती है और वह अपने क्षेत्र में एक विशिष्ट स्थान बना लेता है, तब उसकी शैली की नकल करने वालों की संख्या भी बढ़ने लगती है। विपुल कुमार भी इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति से प्रभावित हो रहे हैं।

किसी कलाकार की कलाकृति की नकल करना केवल एक आकार या डिजाइन की नकल करना नहीं है। उसके पीछे वर्षों की साधना, असफलताओं से सीखा गया अनुभव, माध्यम पर प्राप्त नियंत्रण और अपनी भाषा खोजने की लंबी प्रक्रिया होती है। नकल करने वाला व्यक्ति उस पूरी यात्रा को छोड़कर केवल उसके परिणाम को उठा लेना चाहता है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि ऐसी नकल केवल मूल कलाकार की रचनात्मक पहचान को प्रभावित नहीं करती, बल्कि उसके बाजार और आर्थिक अस्तित्व पर भी असर डाल सकती है। जब वही दृश्य भाषा दूसरे लोग कम कीमत पर प्रस्तुत करने लगते हैं, तो दर्शक और खरीदार के सामने मौलिक और अनुकरण के बीच का अंतर धुंधला होने लगता है।

कला में प्रेरणा लेना स्वाभाविक है। हर कलाकार अपने से पहले आए कलाकारों से कुछ न कुछ सीखता है। लेकिन प्रेरणा और नकल के बीच एक स्पष्ट नैतिक सीमा होती है। प्रेरणा कलाकार को अपनी भाषा खोजने की ओर ले जाती है, जबकि नकल उसे दूसरे कलाकार की भाषा में बोलने की कोशिश बन जाती है। विपुल कुमार का सृजन हमें इसी अंतर को समझने का अवसर देता है।

उनकी यात्रा पत्थर से सेरामिक तक की यात्रा भर नहीं है। यह एक कलाकार के लगातार खोजते रहने की यात्रा है-माध्यम को समझने की, उसे अपनी संवेदना में ढालने की और अंततः ऐसी दृश्य भाषा विकसित करने की जिसे देखते ही कलाकार की पहचान होने लगे। किसी कलाकार की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही होती है कि उसकी रचना उसकी अनुपस्थिति में भी उसके नाम की तरह पहचानी जाए। विपुल कुमार ने अपने सेरामिक शिल्पों के माध्यम से ऐसी ही एक विशिष्ट पहचान निर्मित की है और इसलिए उनकी कला की रक्षा केवल विपुल कुमार की निजी आवश्यकता नहीं है, यह मौलिक सृजन, कलाकार की गरिमा और कला की नैतिकता की रक्षा का प्रश्न भी है।

शशिकांत पांडेय, कला लेखक